ऋषि 1990 में पाकिस्तान में पेशावर वाले पुश्तैनी घर गए थे, लौटते वक्त आंगन की मिट्टी साथ ले आए, ताकि विरासत याद रख सकें
लगातार दूसरा दिन है जब किसी बॉलीवुड सितारे की मौत हुई है। सिसकियां सरहद के इस ओर से भी सुनाई दी हैं। एक दिन पहले इरफान खान और आज ऋषि कपूर की मौत का गम पाकिस्तान में भी है।
जहां एक ओर दिलों पर राज करने वाले ऋषि कपूर की इबारत भारतीय सिनेमा में हमेशा के लिए जिंदा रहेगी वहीं उनके खानदान की विरासत सरहद के इस पार पाकिस्तान में भी खड़ी है। पाकिस्तान में ऋषि कपूर को उनकी अदाकारी के अलावा खैबर पख्तून की राजधानी पेशावर में मौजूद उनके खानदान की जड़ों के लिए भी पहचाना जाता है।
भारतीय सिनेमा के कपूर खानदान की यह मशहूर कपूर हवेली पेशावर के रिहायशी इलाके में हैं और यह कपूर परिवार की कई पुश्तों का घर रहा है। बंटवारे से पहले बनी यह हवेली पृथ्वीराज कपूर के पिता और ऋषि कपूर के परदादा दीवान बशेशवरनाथ कपूर ने 1918-1922 के बीच बनवाई थी। पृथ्वीराज कपूर फिल्म इंडस्ट्री में एंट्री लेनेवाले कपूर खानदान के पहले व्यक्ति थे। इसी हवेली में पृथ्वीराज कपूर के छोटे भाई त्रिलोकी कपूर और बेटे राजकपूर का जन्म हुआ था।
हवेली के बाहर लगी लकड़ी की प्लेट के मुताबिक बिल्डिंग का बनना 1918 में शुरू हुआ और 1921 में पूरा। इस हवेली में 40 कमरे हैं और हवेली के बाहरी हिस्से में खूबसूरत मोतिफ उकेरे हुए हैं। आलीशान झरोखे इस हवेली के ठाठ की गवाही देती हैं।
1947 में बंटवारे के बाद कपूर खानदान के लोग बाकी हिंदुओं की तरह शहर और हवेली छोड़कर चले गए। 1968 में एक ज्वैलर हाजी कुशल रसूल ने इसे खरीद लिया और फिर पेशावर के ही एक दूसरे व्यक्ति को बेच दिया।
फिलहाल हवेली के मालिक हाजी इसरार शाह हैं। वह कहते हैं उनके पिता ने 80 के दशक में यह हवेली खरीदी थी। उस इलाके में रहनेवालों के मुताबिक इस जगह का इस्तेमाल बस शादी ब्याह जैसे जश्न में किया जाता है। पेशावर में ही रहनेवाले वहां पुराने मेयर अब्दुल हाकिम सफी बताते हैं कि ये हवेली पिछले दो दशकों से खाली पड़ी है और इसके मालिक भी कभी कबार यहां आते हैं।
राजकपूर के छोटे भाई शशि कपूर और बेटे रणधीर कपूर और ऋषि कपूर को 1990 में पाकिस्तान के पेशावर वाले अपने पुश्तैनी घर जाने का मौका मिला था। लौटते वक्त वह आंगन की मिट्टी साथ ले आए थे, ताकि अपनी विरासत को याद रख सकें।
ऋषि कपूर ने अपनी इस यात्रा का जिक्र एक इंटरव्यू में भी किया था। वह 1990 में फिल्म हिना की शूटिंग के लिए लाहौर, कराची और पेशावर गए थे। हिना फिल्म भारत-पाकिस्तान का एक प्रोजेक्टर था जिसके डायलॉग राजकपूर के कहने पर पाकिस्तानी लेखक हसीना मोइन ने लिखे थे।
हवेली के पुराने मालिकों ने इस एतिहासिक धरोहर की ऊपरी तीन मंजिलों को कई साल पहले गिरा दिया। भूकंप से उनकी दीवारों में दरारे पड़ गईं थीं। अब यह हवेली आसपास से दुकानों से घिरी है जो इसकी दीवारों पर बोझ बन इसके लिए खतरा पैदा कर रही हैं।
हाल ही में ऋषि कपूर ने पाकिस्तान की सरकार से इसे बचाने में मदद मांगी थी। विदेशमंत्री शाह महमूद कुरैशी कहते हैं ऋषि कपूर ने मुझे फोन किया था। वह चाहते थे उनके पारिवारिक घर को म्यूजियम या इंस्टीट्यूट बना दिया जाए। हमने उनका आग्रह मान लिया है।
पाकिस्तान सरकार पेशावर किस्सा ख्वानी बाजार के उस घर को म्यूजियम बनाने जा रही है। इसमें आईएमजीसी ग्लोबल एंटरटेंमेंट और खैबर पख्तून की सरकार भी मदद कर रही है। पृथ्वीराज कपूर का जहां जन्म हुआ वह हवेली पेशावर में काफी मशहूर है। हाल के दिनों में कई विदेशी पर्यटक और साथ ही स्थानीय लोग उसे देखने आए हैं। वह पाकिस्तान में बॉलीवुड की सबसे मजबूत धरोहर है।
रावलपिंडी में रहनेवाले सिनेमा एक्सपर्ट आतिफ खालिद कहते हैं, कपूर पेशावर के जानेमाने पठान थे। यही वजह थी कि जब पुलिस सब इंस्पेक्टर दीवान बशेश्वरनाथ का बेटा पेशावर से बांबे फिल्मों में काम करने आया तो भारत में तब की सबसे बड़ी फिल्म मैगजीन के एडिटर बाबूराव ने लिखा था – जो पठान ये सोचते हैं कि वह एक्टर बन जाएंगे तो उनकी यहां कोई जगह नहीं है।
पाकिस्तानी पत्रकार शारिक असगर के मुताबिक कला और कलाकारों से कैसा बैर। कपूर भी हमारी तरह ही हैं जो सरहद के दूरी ओर रहते हैं। विदेशियों की बनाएं लकीरें हमारी जड़ों का बंटवारा तो नहीं कर सकतीं।