निकाय चुनाव में ओला का बढ़ा कद, भाम्बू को कैसे मिलेगा मंत्री पद ?

कांग्रेस 30, भाजपा-निर्दलीय 15-15 सीटों पर जीते ; बोर्ड बनाने की कवायद शुरू

सुरेंद्र शर्मा 

झुंझुनू (नवयत्न)। नगर परिषद झुंझुनू के 60 वार्डों के चुनाव परिणाम ने शहर की राजनीति का पूरा समीकरण बदल दिया है। चुनाव में कांग्रेस ने 30 सीटें जीतकर सबसे बड़ा दल बनने में सफलता हासिल की है, जबकि भाजपा और निर्दलीयों के खाते में 15-15 सीटें आई हैं। ऐसे में सभापति पद के लिए जरूरी 31 के जादुई आंकड़े तक पहुंचने के लिए अब जोड़-तोड़ और राजनीतिक संपर्कों का दौर शुरू हो गया है।

परिणामों ने सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश कांग्रेस के लिए दिया है। सांसद बृजेंद्र सिंह ओला और अमित ओला के नेतृत्व वाली कांग्रेस जहां 30 सीटों के साथ सत्ता के सबसे करीब खड़ी दिखाई दे रही है, वहीं भाजपा 15 सीटों पर सिमट गई है। अब कांग्रेस को बहुमत के लिए केवल एक पार्षद की जरूरत है। इसके मुकाबले भाजपा को 16 पार्षदों का समर्थन जुटाना होगा। ऐसे में 15 निर्दलीय पार्षदों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो गई है।

 

ओला परिवार का बढ़ा राजनीतिक कद

 

नगर परिषद के परिणाम को सांसद बृजेंद्र सिंह ओला और अमित ओला के लिए बड़ी राजनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है। चुनाव से पहले जिस झुंझुनू शहर में कांग्रेस के सामने भाजपा की मजबूत चुनौती मानी जा रही थी, वहां 30 सीटों तक पहुंचना ओला परिवार की स्थानीय पकड़ मजबूत होने का संकेत माना जा रहा है।

अब सवाल केवल नगर परिषद के बोर्ड का नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा राजनीति के लिहाज से भी परिणामों को देखा जा रहा है। कांग्रेस यदि निर्दलीयों के समर्थन से बोर्ड बनाने में सफल रहती है तो ओला परिवार के राजनीतिक कद को निश्चित रूप से मजबूती मिलेगी।

 

भाम्बू के सामने बड़ा सवाल मंत्री पद की राह कितनी आसान

 

भाजपा के लिए यह परिणाम खास तौर पर चिंतन का विषय है। विधायक राजेंद्र सिंह भाम्बू के सामने अब केवल बोर्ड बनाने की चुनौती नहीं है, बल्कि अपने राजनीतिक प्रभाव को साबित करने की चुनौती भी है। विधानसभा चुनाव के बाद मंत्री पद को लेकर उनके नाम की चर्चाओं के बीच नगर परिषद में भाजपा का 15 सीटों पर रुक जाना उनके लिए राजनीतिक रूप से सवाल खड़े करता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब अपने ही विधानसभा क्षेत्र के प्रमुख शहरी निकाय में भाजपा बहुमत से इतनी दूर रह गई तो भाम्बू के लिए मंत्री पद की दावेदारी को मजबूत करने का राजनीतिक आधार क्या होगा?

हालांकि नगर परिषद चुनाव और विधानसभा राजनीति अलग-अलग चुनाव हैं, लेकिन स्थानीय निकाय के परिणामों का नेताओं की संगठनात्मक क्षमता और जनाधार के आकलन में राजनीतिक महत्व जरूर रहता है।

 

वार्ड 49 की टिकट बनी भाजपा के लिए नासूर

 

चुनाव से पहले सबसे चर्चित वार्डों में शामिल वार्ड 49 का विवाद अब परिणाम के बाद फिर चर्चा में है। भाजपा ने यहां विधायक राजेंद्र सिंह भाम्बू के दामाद मनु धनकड़ को टिकट दिया था, जबकि भाजपा के ही बागी डॉ. कमलचंद सैनी मैदान में उतर गए थे। यही मुकाबला पूरे चुनाव में भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था।

राजनीतिक गलियारों में अब चर्चा है कि वार्ड 49 की टिकट ने भाजपा के व्यापक चुनावी समीकरण को नुकसान पहुंचाया। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या एक सीट को लेकर लिया गया राजनीतिक फैसला पूरे बोर्ड के गणित पर भारी पड़ गया?

यही वजह है कि जनचर्चा में यह बात भी कही जा रही है “खुद जीते तो पार्टी हारी।” यानी व्यक्तिगत राजनीतिक प्रतिष्ठा की लड़ाई में यदि पार्टी का बोर्ड ही हाथ से निकल जाए तो उस जीत का राजनीतिक लाभ कितना रह जाता है, यह आने वाले दिनों में साफ होगा।

 

निर्दलीयों के हाथ में बोर्ड की चाबी

 

अब सबसे बड़ा सवाल 15 निर्दलीय पार्षदों को लेकर है। कांग्रेस 30 पर है और भाजपा 15 पर। ऐसे में निर्दलीय पार्षद दोनों दलों के लिए निर्णायक हैं। कांग्रेस को केवल एक अतिरिक्त पार्षद का समर्थन चाहिए, जबकि भाजपा को बहुमत तक पहुंचने के लिए निर्दलीयों के लगभग पूरे समूह को अपने साथ लाना होगा।

यहीं से नगर परिषद में राजनीतिक जोड़-तोड़ का असली खेल शुरू होगा। कौन निर्दलीय किस खेमे में जाता है, किसे सभापति पद का समर्थन मिलता है और कौन पार्षद किस राजनीतिक खेमे के साथ खड़ा होता है, इन सब पर अब शहर की नजर रहेगी।

 

30 बनाम 15 की लड़ाई अब 31 के आंकड़े पर

 

चुनाव परिणाम ने तस्वीर साफ कर दी है, लेकिन बोर्ड की तस्वीर अभी साफ नहीं हुई है। कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में 30 सीटों पर है, भाजपा 15 और निर्दलीय भी 15 पर। इसलिए अगला मुकाबला चुनाव मैदान में नहीं बल्कि पार्षदों के समर्थन जुटाने में होगा।

अब देखना यह है कि ओला का बढ़ा कद बोर्ड बनाने में कितना काम आता है और भाम्बू अपनी 15 सीटों के साथ कितने निर्दलीयों को भाजपा के पाले में ला पाते हैं। नगर परिषद की सत्ता का फैसला अब जनता के वोटों के बाद पार्षदों के समर्थन के गणित से होगा।

 

 

इन सुर्खियों ने खींचा ध्यान…..

 

 

प्रत्याशी को नहीं मिला एक भी वोट 

 

कहीं 8 तो कहीं 734 मतों का अंतर

 

महिला : 22 महिलाओं ने जीता चुनाव

 

महिला सशक्तिकरण की दिशा में महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर चुनाव में हिस्सा लिया। कांग्रेस से 14 वहीं भाजपा और निर्दलीयों ने बराबरी करते हुए 4 – 4 महिलाओं ने जीत दर्ज की।

 

वार्ड 7 : सर्वाधिक मत पाने का रिकॉर्ड

 

वार्ड नंबर 7 से कांग्रेस की सुमन ने 1,251 मत हासिल कर सर्वाधिक मत प्राप्त करने का रिकॉर्ड बनाया।

 

वार्ड 41 : सबसे बड़ी जीत

 

वार्ड 41 में कांग्रेस के अब्दुल्ला गुलाम नबी अगवान ने 734 मतों के विशाल अंतर से जीत दर्ज की, जो चुनाव की सबसे बड़ी जीत रही।

 

वार्ड 42 : महज 8 मतों से फैसला

 

वार्ड 42 में कांग्रेस के अजमत अली ने भाजपा प्रत्याशी को सिर्फ 8 मतों से हराया। वहीं वार्ड 3 में भी जीत-हार का फैसला महज 9 मतों के अंतर से हुआ।

 

वार्ड 24 : प्रत्याशी को एक भी वोट नहीं

 

वार्ड 24 की निर्दलीय प्रत्याशी उल्मा राठौड़ को शून्य मत मिले, जो चुनाव के सबसे चौंकाने वाले आंकड़ों में रहा।

 

वार्ड 8 : मजबूत दावेदार को झटका

 

वार्ड 8 में कांग्रेस की संगीता कुमारी ने 508 मत लेकर भाजपा की सुमन देवी (439 मत) को 69 मतों से पराजित किया,स्थापित पार्षदों में थी गिनती।

 

 

वार्ड 9 : निर्दलीय की बड़ी जीत

 

वार्ड 9 में निर्दलीय वीरेन्द्र डारा ने 684 मत प्राप्त कर भाजपा के विकास कुमार को 390 मतों के बड़े अंतर से हराया। विकास कुमार को 294 मत मिले।

 

वार्ड 10 : निर्दलीय ने भाजपा को पछाड़ा

 

वार्ड 10 में निर्दलीय सुरेश ने 555 मत हासिल किए और भाजपा के नरेन्द्र शर्मा को 85 मतों से पराजित किया। नरेन्द्र शर्मा भाजपा नेता कमलकांत शर्मा के अनुज है।

 

वार्ड 11 : भाजपा ने खोला जीत का खाता

 

वार्ड 11 में भाजपा के राजेश बाबल ने 404 मत हासिल कर कांग्रेस के निहाल सिंह (271 मत) को 133 मतों से हराया। इस जीत के साथ भाजपा ने शुरुआती दौर में अपना खाता खोला।

 

वार्ड 15 : 14 मतों का करीबी मुकाबला

 

वार्ड 15 में पूर्व सांसद नरेन्द्र कुमार के दामाद भाजपा के लीलाधर जाखड़ ने 442 मत लेकर कांग्रेस के कुलदीप सिंह (428 मत) को महज 14 मतों से हराया।

 

वार्ड 31 : 13 मतों से निर्दलीय की बाजी

 

वार्ड 31 में निर्दलीय देवकीनंदन वर्मा ने 310 मत हासिल कर कांग्रेस के गोपीचंद कुमावत (297 मत) को महज 13 मतों से हराया।

 

वार्ड 38 : पूर्व पालिकाध्यक्ष 64 मतों से जीते 

 

वार्ड 38 में कांग्रेस के तैयब अली ने 503 मत पाकर निर्दलीय कोमल निर्बाण (439 मत) को 64 मतों से पराजित किया।

 

वार्ड 48 : गोड़े टूट जाएंगे बयान से चर्चा में बना

 

वार्ड 48 में कांग्रेस के प्रदीप कुमार सैनी ने 552 मत लेकर भाजपा के रामकरण (507 मत) को 45 मतों से हराया।यह वार्ड विधायक भाम्बू के विवादित बयान से चर्चा में रहा।

 

वार्ड 49 : सबसे चर्चित मुकाबले का नतीजा

 

वार्ड 49 में भाजपा के मनु धनकड़ ने 651 मत प्राप्त कर निर्दलीय कमल चंद सैनी को 400 मतों के बड़े अंतर से हराया। कमल चंद सैनी को 251 मत मिले। चुनाव से पहले यह मुकाबला राजनीतिक रूप से सबसे चर्चित मुकाबलों में शामिल रहा।

 

नतीजे आते ही शुरू हुई पार्षदों की बाड़ाबंदी

 

 

नगर परिषद झुंझुनूं के 60 वार्डों के पार्षदों के चुनाव परिणाम जैसे-जैसे सामने आते गए, वैसे-वैसे कांग्रेस और भाजपा दोनों प्रमुख दलों ने संभावित बोर्ड गठन को लेकर बाड़ाबंदी शुरू कर दी। परिणाम घोषित होने के बाद विजयी पार्षदों की आवाजाही और उन्हें अपने-अपने खेमे में रखने की कवायद तेज हो गई।

शहर के सेठ मोतीलाल संकुल सदन में परिणाम घोषित होने के बाद कुछ विजयी पार्षद जैसे ही बाहर निकले, वे अपने समर्थकों की गाड़ियों में सवार होकर सीधे अपने राजनीतिक आकाओं के पास पहुंच गए। इस दौरान दोनों प्रमुख दलों के रणनीतिकारों और सिपहसालारों ने भी अपनी भूमिका निभाई।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्तमान झुंझुनूं सांसद बृजेंद्र सिंह ओला के नेतृत्व में कांग्रेस से जीतकर आए 30 पार्षदों के साथ 6 निर्दलीय पार्षदों को बस और काले रंग की किआ गाड़ी के जरिए किसी अज्ञात स्थान के लिए रवाना किया गया। हालांकि इन पार्षदों को कहां ले जाया गया, इसकी आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

वहीं दूसरी ओर भाजपा की बाड़ाबंदी की कमान विधायक राजेंद्र भाम्बू के हाथ में बताई जा रही है। भाजपा के कुछ पार्षद पहले से ही पार्टी की बाड़ाबंदी में बताए जा रहे हैं। अब परिणाम आने के बाद अन्य संभावित विजयी पार्षदों को भी एकजुट रखने की कवायद तेज हो गई है।

नगर परिषद में सभापति बनाने के लिए 31 पार्षदों का बहुमत जरूरी है। ऐसे में कांग्रेस के 30 सीटों पर जीत दर्ज करने के बाद 6 निर्दलीयों को अपने साथ रखने की कोशिश को बोर्ड गठन के लिहाज से अहम माना जा रहा है। दूसरी तरफ भाजपा भी अपने पार्षदों के साथ निर्दलीयों को साधने की रणनीति पर काम कर रही है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि 31 के जादुई आंकड़े तक कौन सा दल पहुंचता है या फिर किसी तिकड़म या जनादेश को दिया जाता है अंजाम।

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