15+15=31 का खेल, अब ‘दो और दो पांच’ कैसे?
कासं
झुंझुनूं (नवयत्न)। सन 1980 में आई फिल्म दो और दो पांच के गीत का मुखड़ा “हम वो हैं जो दो और दो को पांच बना दें” इन दिनों झुंझुनूं नगर परिषद की सियासत में जैसे जीवंत होता दिखाई दे रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां सवाल दो और दो को पांच बनाने का नहीं, बल्कि 15+15 को 31 बनाने का है।
60 सदस्यीय नगर परिषद में जनता ने कांग्रेस को 30, भाजपा को 15 और निर्दलीयों को 15 सीटें दी हैं। बहुमत का आंकड़ा 31 है। कांग्रेस के पास 30 हैं यानी दरवाजे पर बहुमत खड़ा है, जबकि भाजपा के पास 15 हैं और उसे बहुमत तक पहुंचने के लिए 16 कदम और चलने होंगे।
गणित की किताब में 15+15=30 होता है। लेकिन झुंझुनूं की राजनीति में अब यही सवाल सबसे बड़ा है क्या राजनीतिक जोड़-तोड़ गणित के इस नियम को भी बदल देगा?
भाजपा का दावा: 15+15 नहीं 31
भाजपा की ओर से वर्तमान विधायक राजेंद्र भाम्बू के दामाद मनु धनकड़ को सभापति पद के दावेदार के रूप में है। दूसरी तरफ कांग्रेस के अब्दुल्ला गुलाम नबी अगवान का नाम सामने है।
भाजपा के सामने सीधा सवाल है 15 अपने, 15 निर्दलीय और फिर भी 30 । 31वां कहां से आएगा?
यही वह 31वां वोट है जिसके लिए अब सियासत में हर दरवाजा खटखटाया जा सकता है। निर्दलीयों की कीमत बढ़ गई है और हर पार्षद अचानक ‘निर्णायक’ बन गया है। जिसे जनता ने निर्दलीय भेजा, वह अब दोनों खेमों के लिए सत्ता की चाबी बन गया है।
कांग्रेस बहुमत के दरवाजे पर, लेकिन कुंडी भीतर से
कांग्रेस भले ही 30 सीटों के साथ बहुमत से सिर्फ एक वोट दूर हो, लेकिन राजनीति में एक वोट भी कभी-कभी बहुत भारी पड़ता है। 30 पार्षदों को एकजुट रखना कांग्रेस की पहली परीक्षा होगी।
नामांकन रद्द होने से जुड़े घटनाक्रम के बाद कांग्रेस खेमे में नए नाम जुड़ने की चर्चा ने भी समीकरणों को और दिलचस्प बना दिया है। ऐसे में कांग्रेस के लिए सवाल यह नहीं कि 31वां पार्षद कहां से आएगा, बल्कि सवाल यह है कि उसके 30 के 30 सुरक्षित रहेंगे या नहीं।
भाजपा को निर्दलीयों से पहले अपने पार्षदों का हिसाब रखना होगा
भाजपा निर्दलीयों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसके सामने एक और बड़ा खतरा है क्रॉस वोटिंग।
झुंझुनूं की पिछली नगर परिषद में भाजपा प्रत्याशी के खिलाफ भाजपा के ही पार्षदों की क्रॉस वोटिंग का उदाहरण सामने आ चुका है और इसके बाद नगमा बानो सभापति बनी थी।
इसलिए इस बार सवाल सिर्फ यह नहीं कि भाजपा कितने निर्दलीय पार्षद अपने साथ जोड़ती है। सवाल यह भी है कि उसके 15 में से कितने वोट उसके प्रत्याशी के साथ खड़े रहते हैं।
सियासत में कोई सगा नहीं, जो साथ वही अपना!
सभापति चुनाव तक राजनीतिक रिश्तों की परिभाषा भी बदल सकती है। कल तक जो विरोधी था, वह आज साथी हो सकता है और जो अपना था, वह मतदान के वक्त किस तरफ खड़ा हो जाए इसकी कोई गारंटी नहीं।
निर्दलीय पार्षदों के सामने भी बड़ा फैसला होगा। वे किस खेमे में जाते हैं, उसके पीछे क्या राजनीतिक समीकरण बनते हैं और क्या शर्तें सामने आती हैं, यह सब अंतिम समय तक चर्चा का विषय बना रहेगा।
अब झुंझुनूं नगर परिषद में जनादेश का गणित और सत्ता का गणित आमने-सामने है। जनता ने 31-15-15 का आंकड़ा दिया है, लेकिन सत्ता की कुर्सी के लिए 31 चाहिए।
15+15=30 तो सब जानते हैं… अब 15+15=31 कौन और कैसे करता है, यही झुंझुनूं की सियासत का सबसे बड़ा सवाल है।
अगर भाजपा यह आंकड़ा जुटा लेती है तो “दो और दो पांच” का गीत झुंझुनूं की राजनीति में सच होता दिखाई देगा और अगर गणित अटक गया तो फिर सियासी दावों का हिसाब जनता के सामने खुद खुल जाएगा।