फ्लिपकार्ट पर लगा 13,800 रुपए का जुर्माना, उपभोक्ता को बिना बताए ऑर्डर कैंसिल किया
डार्क पैटर्न’ प्रैक्टिस पर आयोग की कड़ी टिप्पणी
संजय सोनी
झुंझुनूं (दैनिक नवयत्न ) । जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, झुंझुनूं ने ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट इंटरनेट प्राइवेट लिमिटेड और उसकी लॉजिस्टिक्स पार्टनर इंस्टाकार्ट सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए 13,800 रुपए का जुर्माना लगाया है। आयोग ने बिना सूचना और सहमति के ग्राहक का ऑर्डर रद्द करने को सेवा में कमी, अनुचित व्यापार प्रथा और ‘डार्क पैटर्न’ जैसी छद्म व्यावसायिक रणनीति करार दिया है।
यह फैसला आनंदपुरा निवासी लोकेश सिंह की शिकायत पर आयोग अध्यक्ष मनोज कुमार मील और सदस्य प्रेमेंद्र कुमार सैनी की पीठ ने सुनाया। आयोग ने कहा कि डिजिटल युग में बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है और ग्राहकों के भरोसे के साथ इस प्रकार का व्यवहार स्वीकार्य नहीं है।
कंपनी का बचाव नहीं आया काम:
सुनवाई के दौरान फ्लिपकार्ट ने खुद को केवल मार्केटप्लेस बताते हुए कहा कि ऑर्डर विक्रेता द्वारा रद्द किया गया और ग्राहक को रिफंड दे दिया गया था। कंपनी ने यह भी दावा किया कि संबंधित पिनकोड पर डिलीवरी संभव नहीं थी।
हालांकि आयोग ने पाया कि ग्राहक को पिनकोड समस्या की कोई पूर्व सूचना या सहमति नहीं ली गई। उलटे कंपनी के संदेश में डिलीवरी में देरी के कारण विक्रेता द्वारा ऑर्डर रद्द करने की बात सामने आई, जिसे आयोग ने अनुचित व्यापार व्यवहार माना।
आयोग का आदेश :
आयोग ने माना कि ऑर्डर राशि पहले ही लौटाई जा चुकी है, इसलिए उसका भुगतान दोबारा नहीं होगा। लेकिन मानसिक संताप और असुविधा के लिए 10,500 रुपए तथा न्यायिक खर्च के 3,300 रुपए यानी कुल 13,800 रुपए देने का आदेश दिया गया।
यह राशि 45 दिनों में 6 प्रतिशत ब्याज सहित देनी होगी। तय समय में भुगतान नहीं होने पर 9 प्रतिशत ब्याज लागू होगा।
आयोग की सख्त टिप्पणी:
आयोग ने कहा कि इस तरह का व्यवहार ‘डार्क पैटर्न’ और अनुचित व्यापार प्रथा का उदाहरण है, जो डिजिटल इंडिया के तहत ई-कॉमर्स में पारदर्शिता और विश्वास की भावना को कमजोर करता है। साथ ही यह भी माना कि ऐसे कृत्य से ग्राहक को मानसिक व शारीरिक पीड़ा होना स्वाभाविक है।
यह फैसला ऑनलाइन खरीदारी में उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से अहम माना जा रहा है और ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए स्पष्ट संदेश देता है कि ग्राहक हितों की अनदेखी महंगी पड़ सकती है।
मामले का रोचक बिंदु यह रहा की कंपनी ने उपभोक्ता से ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर 902 रुपए में प्रोडक्ट उपलब्ध करवाने का परिवचन कर राशि प्राप्त की थी और प्रार्थी को प्रोडक्ट देने के बजाय आर्डर कैंसिल कर दिया। वही प्रोडक्ट ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कुछ समय बाद 2,097 रुपए का प्रदर्शित किया जाने लगा , जिसमें प्रार्थी द्वारा प्रोडक्ट की मांग पुनः किए जाने पर उसी प्लेटफार्म पर पुनः इस राशि (902 रुपए) में खरीद की स्वीकृति नहीं दी गई। इसे डार्क पैटर्न प्रथा (छद्म व्यापार ) मानते हुए निर्णय में आयोग अध्यक्ष मनोज कुमार मील ने टिप्पणी की है कि वर्तमान समय में डिजिटल इंडिया प्लेटफार्म के सदुपयोग के रूप में प्रार्थी की तरह बहुत से नागरिक ऑनलाइन प्रोडक्ट बुक करने पर डिलीवरी प्राप्त करने का कार्य व्यवहार कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में सेवा प्रदाता कंपनी की नैतिक जिम्मेदारी निश्चित रूप से बढ़ जाती है।
मामला ऐसे बढ़ा विवाद तक:
— 23 जनवरी 2025 को 902 रुपए में ऑनलाइन ऑर्डर किया गया।
— UPI से भुगतान और ऑर्डर कन्फर्मेशन मिला।
— डिलीवरी 26 जनवरी तय थी, बाद में देरी की सूचना दी गई।
— 27 जनवरी तक प्रोडक्ट नहीं पहुंचा, शिकायत पर 30 जनवरी तक समाधान का आश्वासन मिला।
— 28 जनवरी को बिना सहमति ऑर्डर रद्द कर दिया गया।
— बाद में वही प्रोडक्ट 2097 रुपए में दिखने लगा और पुराने दाम पर ऑर्डर की अनुमति नहीं दी गई।