विश्व स्तरीय हाहाकारी, कोरोना महामारी के इस दौर में लॉकडाउन, सजा या सबक
हम पुरातन भारतीय संस्कृति, परंपराओ, रीति-रिवाजों, जीवनशैली को फिर एक बार अपने दैनिक जीवन में अपनाएं, जीत तय है।
जयपुर, 5 मई। विश्व के करीब 180 देशों के करोड़ों निवासियों को अभी इस अदृश्य शत्रु से निजात पाने में अथक प्रयास एवं जुझारू प्रवृत्ति के उच्चतम प्रयासों को सुनिश्चित करना होगा। संक्रमण रूपी इस अदृश्य हमले से बचाव के लिये विश्व के तमाम देशो ने जिनमे न केवल अर्धविकसित, विकासशील वरन विकसित राष्ट्रों ने भी अपने निवासियो की सुरक्षा के यथासंभव उपाय किए है। यहा यह भी समझना नितांत आवश्यक है कि कोरोना रूपी यह शत्रु विकसित, विकासशील एवं अर्ध विकसित राष्ट्रों में कोई भेद नहीं कर रहा । ऐसी परिस्थितियों में वे राष्ट्र एवं उनके नागरिक ही इस हमले से अपने को बचा पाएंगे जो समय रहते उचित प्रयास जिनमे सामाजिक जीवन शैली, उचित चिकित्सा सुविधाओं, यातायात के साधनों एवं स्वच्छता के मानदंडों आदि का प्रभावशाली उपयोग करेंगे। इस महामारी के प्रारंभ से लेकर अब तक के करीब 4 माह से ज्यादा के आंकड़ों का विवेचन करें तो हम पाएंगे कि अमेरिका, जर्मनी, इंग्लैंड, इटली फ्रांस इत्यादि जैसे विकसित राष्ट्रों मे इसका दंश ज्यादा महसूस किया जा रहा है। कहने में अतिशयोक्ति नहीं कि उक्त वर्णित राष्ट्र आज संसाधनो की दृष्टि से संसार के अन्य देशो से कई गुना आगे है। लेकिन पर्याप्त संसाधनों, सुविधाओं के बावजूद इन राष्ट्रों की बेबसी में एक बड़ा संदेश भी निहित है। बेशक महामारी पर नियंत्रण एवं जीत के लिए ठोस कार्य योजनाओं का अपना अतुलनीय महत्व है, जिसको कोई नकार नहीं सकता, तमाम राष्ट्रों की सरकारें सुनिश्चित भी कर रही है लेकिन कहीं न कहीं इन राष्ट्रों की इस दुर्दशा का कारण उनका सामाजिक रहन-सहन भी है। त्वरित जीवनशैली ने खानपान, प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधनों के तारतम्य को तहस-नहस कर मानव की प्रतिरोधात्मक शक्ति को क्षीण कर दिया है। यह उसी का ही परिणाम है कि तमाम सुविधाओं, संसाधनो की उपलब्धता के बावजूद ये राष्ट्र बेबस नजर आ रहे है। कोरोना वायरस के इस विकराल हमले में मानव जाति के लिए एक गहरा संदेश निहित है जिसको समझना एवं जानना संसार के हर राष्ट्र एवं उसके नागरिकों के लिए अत्यंत आवश्यक है। ऐसे में रहन-सहन की भारतीय सभ्यता एवं सामाजिक ताना-बाना जो कि पाश्चात्य जीवन शैली के प्रभाव स्वरूप विलुप्त सा हो रहा है, को पुन: अपनाने मे ही मानव जाति का हित संभव है। प्राचीन भारतीय जीवनशैली आहार, व्यायाम, प्रकृति, संयम, अनुशासन, सेवा, पारिवारिक मूल्यों, साफ-सफाई, संवेदना, मितव्यव्यता, चिकित्सा, योग आदि का ऐसा अद्भुत सम्मिश्रण है जिससे एक स्वस्थ, बलवान एव मर्यादित समाज की रचना की जा सकती है। कोरोना वायरस से बचाव के लिए घोषित राष्ट्रव्यापी लाकडाउन शायद हमे इन्ही महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने के लिए अवतरित हुआ है। लाकडाउन के बाद हमारी दिनचर्या का बिंदुवार विवेचन करने पर हम इसे और समग्र रूप से समझ पाएंगे।
खानपान विगत कुछ वर्षों से यह रोजमर्रा की जीवन शैली का ऐसा पहलू है जिसमें बहुत बदलाव हुआ है अपनी भौतिक आवश्यकताओं की चाह एवं धन अर्जन की महत्वाकांक्षा मे मनुष्य इतना अन्तरभावन हो गया है कि उसे अक्सर खाना बनाने पर लगाया गया समय व्यर्थ गवाया लगता है, जिस्का प्रयोग कुछ और श्रम कर अधिक पैसा अर्जित करने को हो सकता है। इसी सोच ने आज फ़ास्ट फ़ूड एव उसकी त्वरित सुपुर्दगी का एक नया चलन निकाला है। ऐसा नही है की खाना मुहैया कराने की इस पद्धति का चलन महानगरों तक सीमित है वरन छोटे शहरो मे भी यह खुब फल फुल रहा है। अफसोस लॉक डाउन की इस अवधी में इन समस्त गतिविधियो को गैर जरुरी मानते हुए बंद कर दिया गया है।ऐसा नही है कि इन व्यव्स्थाओ की गैर मोजुदगी मे हम भुखे पेट सो रहे है। इस के ठीक विपरीत घर के स्वच्छ वातावरण में पके स्वादिष्ट भोजन का भरपूर आनंद ले रहे है।
लॉक डाउन से सबक हमें यह समझना है कि इस त्वरित भोजन की धारणा को अपनी जीवनशैली में कहां तक जगह देनी है। वहां तक कि यह एक शौक या आकस्मिक परिस्थितियों के निवारण में मददगार रहे या फिर बेवजह के दिखावे में वहां तक कि जहा हमारा स्वास्थ्य जवाब दे दे।
पारिवारिक मूल्य भौतिकवादी वस्तुओं के पाने की लालसा में आज हम इतने व्यस्त हैं कि परिवार के लिए समय नहीं दे पाते। कही मन मे घर बनाने कि ललक तो कही उच्च दर्जे की चार पहिया वाहन की चाह, तो कही विदेश यात्रा का मोह। विडम्बना यह है कि जो संसाधन पहले से उपलब्ध है उन तक का उपभोग नहीं कर पा रहे हैं पर और अधिक पाने की लालसा में पारिवारिक मूल्यों को ताक पर रखकर अपने आपको अंधी दौड़ में बेवजह झोंके जा रहे हैं। जबरन घर पर कैद होने के बाद एहसास हो रहा है कि खुशियां बहुत सी विद्यमान हैं पर समय की व्यस्तता ने आभास ही नही करवाया। बुजुर्ग माता-पिता के साथ बैठकर बतियाना, बच्चों की छोटी-छोटी जिज्ञासाओं एवम, भविष्य बनाने के बडे बडे फ़ैसलो पर बात करना, दिन में दो बार परिवार के साथ खाने की टेबल पर साथ होना, बुजुर्ग माता-पिता के साथ समय बिता कर उन्हें प्रफुल्लित करना एवम अगली पीढ़ी में उक्त संस्कारों का रोपण करना।
लॉक डाउन से सबक भौतिक आवश्यकताओं की प्राप्ति की दौड़ को कहां तक रखना है, वहा तक कि जहा समस्त संसाधन हासिल हो पर परिवार छिन्न-भिन्न हो जाये, या वहा तक कि जहा परिवार के साथ उपलब्ध संसाधनों का भरपूर आनन्द लिया जाए।
मितव्ययिता खूब कमाओ एवं खूब उड़ाओ प्रवृति से अपव्यय को बढ़ावा एव मस्तिष्क को तनाव कि स्थिति रहती है। लॉकडाउन के इस काल में समस्त उपलब्ध वस्तुओं, संसाधनो का उच्चतम एव किफायती उपयोग सुनिश्चित किया जा रहा है क्योंकि आगे उपलब्धता हो या न हो फिर चाहे वो खानपान की वस्तु हो, सौंदर्य प्रसाधन हो या ऐसी कोई अन्य दैनिक उपयोग की वस्तुएं।
लॉक डाउन से सबक परिस्थितिवश हम अपने आप को मितव्ययी बना सकते है तो क्यो ना अपने दैनिक जीवन मे मितव्ययता अपनाकर सुविधाओ, संसाधनो के पुर्ण उपयोग को सुनिश्चित करे एव बेवजह के तनाव को न्योता न दे।
प्रदूषण बदलते सामाजिक परिवेश एवं भौतिकवादी प्रवृत्ति के प्रति बढ़ते आकर्षण ने न केवल हमारी मानसिक शांति एवं दृढ़ता को प्रभावित किया है वरन उपलब्ध संसाधनों के अति उपयोग को भी बढ़ावा दिया है जिससे हवा पानी एवं मिट्टी जैसे तत्वों का अत्यधिक दोहन पर्यावरणीय क्षरण का कारण बन रहा है।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण है हमारी सड़कों पर दौड़ते बेतरतीब दो पहिया एवं चार पहिया वाहन, जिनसे उत्सर्जित वायु प्रदूषण एवं ध्वनि प्रदूषण आज हमारे स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बनते जा रहे है। जीवन की आपाधापी में इन संसाधनों के मितत्व्ययी उपभोग को भुलाते हुए हमने अपने लिये मुसीबते ही खड़ी कर दी है। आवश्यकता है “जरुरत एवं उपभोग” मे सामंजस्य बनाने की जिससे हम हम अपने आसपास के वातावरण को स्वच्छ एवं प्रदूषण मुक्त बना सकें।
लॉकडाउन से सबक प्रशासनिक निर्देशो एवं कठोरता के फलस्वरुप आज हमारे आवागमन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा हुआ है, न वाहनों का शोर न धुएं का गुबार। ऐसी स्थिति ने हमें इस धुएं के गुबार व कर्कश ध्वनि से मुक्त कर दिया है। जरुरत है इस थोपी गई पाबन्दी से सबक लेते हुए उपभोग को सीमित कर वातावरण को प्रदूषण से बचाने क़ी ।
बचत यहां एक अति महत्वपूर्ण विषय का उल्लेख आवश्यक है वह है “बचत”। भारतीय संस्कृति में बचत को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। कहावत है कि ₹100 कमाओ भले ही 99 खर्च कर दो लेकिन 1 अवश्य बचाओ, आड़े समय में बचत ही काम आती है। हारी, बीमारी और मुसीबत के समय मे पहले की हुई बचत का ही सहारा रहता है। इसका सबक हमें भारत की आधी आबादी अर्थात महिलाओं से सीखने की आवश्यकता है।
कुल मिलाकर लब्बो लुआब यह कि दूध फट जाने पर दुखी ना हो कर उससे रसगुल्ले बनाने जैसी सकारात्मक सोच रखने वाला ही हमेशा फायदे में रहता है। लॉक डाउन को सजा अथवा थोपी गई पाबंदी न समझें, इससे मिले हुए समय का सदुपयोग करें, हमारी पुरातन भारतीय संस्कृति, परंपराओ, रीति-रिवाजों, जीवनशैली को फिर एक बार अपने दैनिक जीवन में अपनाएं ताकि हम विपरीत परिस्थितियों में भी जीत की राह पर चल सके।
हरीश गुरनानी (विचारक एवं लेखक )
डायरेक्टर, मेवाड़ यूनिवर्सिटी राजस्थान