स्त्रीत्व का सम्मान ही नारी सशक्तिकरण का वास्तविक मार्ग

 

झुंझुनू ( दैनिक नवयत्न ) । भारत में नारी सशक्तिकरण और नारीवादी आंदोलनों ने पिछले कुछ दशकों में समाज में महत्वपूर्ण बदलाव लाने का कार्य किया है। इन आंदोलनों ने महिलाओं को शिक्षा, रोजगार, राजनीति और सामाजिक जीवन में आगे बढ़ने के अवसर प्रदान किए हैं। आज महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा, नेतृत्व क्षमता और परिश्रम का प्रभावी परिचय दे रही हैं।

भारतीय संस्कृति में सदैव नारी को शक्ति स्वरूपा माना गया है। धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में भी यह स्पष्ट उल्लेख है कि जब महिषासुर, मधु-कैटभ और शुंभ-निशुंभ जैसे दानवों के आतंक से देवता भी असहाय हो गए, तब शक्ति स्वरूपा देवी ने उनका संहार कर सृष्टि की रक्षा की। यह दर्शाता है कि भारतीय परंपरा में नारी केवल सहानुभूति का प्रतीक नहीं, बल्कि शक्ति, नेतृत्व और निर्णय क्षमता की प्रतीक भी रही है।

फिर भी वर्तमान समय में यह बहस उभर रही है कि कहीं नारीवाद की दिशा ऐसी तो नहीं हो रही, जिसमें स्त्रीत्व के मूल गुणों को महत्व देने के बजाय महिलाओं को पुरुषों की तरह बनने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

वास्तव में नारीवाद का उद्देश्य महिलाओं को पुरुषों के समान बनाना नहीं, बल्कि उन्हें समान अधिकार, सम्मान और अवसर प्रदान करना है। स्त्री और पुरुष प्रकृति के दो अलग-अलग किन्तु पूरक पक्ष हैं। दोनों की अपनी विशिष्ट भूमिकाएं हैं, जो समाज के संतुलन के लिए आवश्यक हैं। इसलिए स्त्री और पुरुष को प्रतिस्पर्धा की दौड़ में खड़ा करना न तो उचित है और न ही समाज के लिए लाभकारी।
भारतीय संस्कृति में स्त्री को शक्ति, करुणा, ममता और सृजन की प्रतीक माना गया है। स्त्रीत्व के ये गुण समाज की सबसे बड़ी ताकत हैं, न कि कमजोरी। आवश्यकता इस बात की है कि इन गुणों का सम्मान किया जाए और उन्हें कमतर नहीं आंकना चाहिए।
स्त्री की संवेदनशीलता, धैर्य, सहनशीलता और सृजनशीलता समाज को मानवीय मूल्यों से जोड़कर रखती है। परिवार और समाज के संस्कारों को आगे बढ़ाने में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक शिक्षित और जागरूक महिला न केवल अपने परिवार को बल्कि पूरे समाज को सकारात्मक दिशा दे सकती है।

घर का संचालन और परिवार की देखभाल करने वाली गृह संरक्षिकाओं के योगदान को भी कभी कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। उन्हें यह महसूस नहीं करवाना चाहिए कि वे कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं कर रही हैं। वास्तव में वे ही समाज की उस मूल संरचना को संभालती हैं, जिसके आधार पर आने वाली पीढ़ियों का निर्माण होता है।
प्राकृतिक रूप से महिलाओं की एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका यह भी रही है कि वे समाज की विरासत, संस्कृति और संस्कारों का हस्तांतरण नई पीढ़ी तक करती हैं। आने वाली पीढ़ी को संस्कारवान, जिम्मेदार और समृद्ध बनाना केवल जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक जिम्मेदारी भी है। यदि नई पीढ़ी नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ी होगी, तभी समाज का संतुलन और सभ्यता की निरंतरता बनी रह सकती है।

आज सोशल मीडिया की चकाचौंध और पश्चिमी जीवनशैली के अंधानुकरण के कारण कुछ भ्रम तेजी से फैल रहे हैं। कई बार यह संदेश दिया जाता है कि व्यक्ति को समाज या परिवार से कोई सरोकार नहीं होना चाहिए, संतान की जिम्मेदारी लेना आवश्यक नहीं है, और अकेले जीवन जीना ही आधुनिकता है। कुछ स्थानों पर यह धारणा भी बन रही है कि संतान एक बोझ है या बुजुर्ग ‘प्राइवेसी’ में बाधा हैं।
इस प्रकार की सोच समाज के मूल ढांचे को कमजोर कर सकती है। भारतीय सभ्यता हजारों वर्षों से पारिवारिक मूल्यों, आपसी सहयोग और पीढ़ियों के बीच संस्कारों के आदान-प्रदान के कारण अक्षुण्ण रही है। यदि परिवार और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना कमजोर होगी, तो इसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ेगा।
ऐसे समय में महिलाओं की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि महिलाएं अपने दायित्व और महत्व को समझते हुए परिवार, संस्कार और समाज के बीच संतुलन बनाए रखें, तो वे आने वाली पीढ़ियों को सही दिशा दे सकती हैं।

पुरुषों का भी यह दायित्व बनता है कि वे अपने घर की कामकाजी महिलाओं का सहयोग करें और घर-परिवार की जिम्मेदारियों को साझा करें। वास्तव में नारी सशक्तिकरण का अर्थ यही है कि स्त्री अपनी शक्ति, संवेदनशीलता और नेतृत्व क्षमता के साथ समाज को सकारात्मक दिशा देने में सक्षम बने।
समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब स्त्री और पुरुष दोनों एक-दूसरे की विशिष्टताओं का सम्मान करते हुए साथ आगे बढ़ें। नारी सशक्तिकरण का सही स्वरूप वही है जो स्त्रीत्व की गरिमा बनाए रखते हुए महिलाओं को सम्मान, अधिकार और अवसर दिलाने का मार्ग प्रशस्त करे। यदि हम इस संतुलन को समझ पाए, तो न केवल हमारा सामाजिक ढांचा मजबूत रहेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक सशक्त और संस्कारित समाज का निर्माण हो सकेगा।

सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि कामकाजी महिलाओं को घरेलू कार्यों में परिवार का सहयोग मिले और परिवार का संचालन करने वाली गृह संरक्षिकाओं को भी समान सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त हो, ताकि उन्हें कभी हीनभावना का अनुभव न हो।

हिमांशु सिंह
जिला संयोजक,
अखिल भारतीय साहित्य परिषद

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