आस्तिक विचारधारा वर्तमान जीवन के लिए भी कल्याणकारी : आचार्य महाश्रमण
अबुबकर बल्खी
लाडनूं (नवयत्न)। शुक्रवार को तेरापंथ धर्मसंघ के अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण ने जैन विश्व भारती में सुधर्मा सभा में संबोधित करते हुए कहा कि जो परलोक, आत्मा, पुण्य-पाप, मोक्ष आदि में विश्वास करता है, वह आस्तिक होता है और जो परलोक को नहीं मानता, आत्मा-परमात्मा को नहीं मानता, पुण्य-पाप को नहीं मानता, वह नास्तिक होता है। नास्तिकवाद कहता है कि मौज-मस्ती में जीवन जीओ, जो मन में आ जाए वहीं करो । पुनर्जन्म होगा नहीं, तो इस जीवन में खूब ऐश-आराम करो। वहीं आस्तिक विचारधारा कहती है कि आत्मा है, परलोक है, पुण्य-पाप का फल होता है, पुनर्जन्म भी होता है। कई सारी बातों के माध्यम से इसे माना जा सकता है कि पूर्वजन्म और पुनर्जन्म होता है। शास्त्र में कहा गया है कि आदमी को स्वर्गलोक है अथवा नहीं, इस बात को छोड़कर अच्छे कार्यों को करने का प्रयास करना चाहिए। यदि स्वर्ग हुआ तो अच्छे कार्य किए हैं तो उसका अच्छा फल मिलेगा। वर्तमान जीवन भी अच्छा रहेगा। जीवन में शांति रहेगी। यदि नहीं हुआ तो भी वर्तमान जीवन अच्छा रहेगा ही, अच्छे कार्यों को करने से आदमी का क्या नुकसान होने वाला है। यदि परलोक है तो फिर नास्तिक आदमी का क्या हाल होगा, वह ही जाने। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रावक श्राविकाएं एवं योगक्षेम प्रवास वर्ष व्यवस्था समिति के पदाधिकारी गण मौजूद रहे।