12 मार्च वर्ल्ड किडनी दिवस विशेष
संजय सोनी
बुगाला (नवयत्न ) । व्यक्ति अपने हौंसले और मजबूत इरादों से सफलता की एक नई इबारत लिख सकता है चाहे परिस्थितिया कितनी भी विपरीत क्यों न हो। ऐसी ही एक नजीर पेश की है जाखल भवानी सिंह शेखावत ने। कम उम्र में दोनों किडनी खराब होने के कारण मृत्यु की दहलीज पर पहुंच गए थे ।लेकिन उसके बाद उन्होंने अपने आत्मबल से जो सफलताओं की कहानी लिखी वह इस दुनिया में बिरले लोग ही है जो कर पाते हैं। 19 वर्ष की उम्र में कॉलेज में पढ़ाई के दौरान दोनों किडनी खराब होने से भवानी सिंह 4 माह तक जिंदगी और मौत से संघर्ष करते रहे।उसके बाद उनके पिताजी स्वर्गीय घनश्याम सिंह ने अपनी एक किडनी दान देकर उन्हें दूसरा जीवन दिया। लेकिन इसके बाद भी इनकी कठिनाइयां कम नहीं हुई। पिता की किडनी खुद के शरीर में होने से मंहगी जीवनरक्षक दवाइयां लेनी पड़ी,जिनका विपरीत प्रभाव यह होता है कि वो उस किडनी को बचाने के लिए खुद के शरीर की रोगप्रतिरोध शक्ति को कम कर देती है, इससे दूसरे को होने वाला मामूली संक्रमण या बीमारी भी उस मरीज को आसानी से लग जाती है।इतनी कठिन शारीरिक बाध्यता के बावजूद भी हिम्मत नहीं हारी और अपनी नर्सिंग की पढ़ाई पूरी की और आरपीएससी द्वारा आयोजित नर्स भर्ती परीक्षा 2010 में पूरे राजस्थान में 20 वीं रैंक प्राप्त कर सरकारी नौकरी हेतु चयनित हुए।इन्होंने राजस्थान ही नहीं रेलवे की नर्सिंग सेवा,एम्स दिल्ली,पीजीआई चंडीगढ़,अहमदाबाद आदि की परीक्षा भी पास की लेकिन अपनी शारीरिक परिस्थिति और माता-पिता की सेवा के चलते अपने खुद के गांव में पोस्टिंग लेना उचित समझा। धीरे धीरे शारीरिक परिस्थिति में सुधार होने पर उन्होंने खेलो में रुचि लेना शुरू किया और पहली बार 2016 में मुंबई में आयोजित नेशनल ट्रांसप्लांट खेलो में भाग लिया और रजत पदक प्राप्त किया। इस पदक के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और ट्रासप्लांट खेलो के इतिहास में इतने कीर्तिमान स्थापित कर दिए की उन्हें देखकर नवीन अंगप्राप्तकर्ता खिलाड़ी प्रेरणा लेते है।
2016 के बाद प्रतिवर्ष उन्होंने राष्ट्रीय ट्रांसप्लांट खेलो में भाग लिया और हर बार उन्होंने पदक प्राप्त किया। वर्ष 2023 में अप्रैल माह में ऑस्ट्रेलिया के पर्थ शहर में आयोजित वर्ल्ड ट्रांसप्लांट खेल में भाग लेने वाले भारतीय दल का सदस्य बनने का मौका मिला और उन्होंने उस मौके पर विश्वपटल पर राजस्थान का स्वर्ण अक्षरों में इतिहास लिख दिया।उन्होंने पेंटाक खेल की व्यक्तिगत स्पर्धा में रजत पदक प्राप्त कर भारत का नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया।वे राजस्थान के पहले खिलाड़ी बने जिन्होंने वर्ल्ड ट्रांसप्लांट खेलो के इतिहास में पदक जीता हो। इन खेलो के अंतिम दिन लॉनबाल खेल की व्यक्तिगत स्पर्धा में भी कांस्य पदक हासिल किया। इस प्रकार इन्होंने अपने पहले ही वर्ल्ड ट्रांसप्लांट खेलो में दो पदक हासिल किए।उसके बाद उन्होंने सितंबर 2023 में बैंकॉक में आयोजित एशियन पेटांक ट्रांसप्लांट चैंपियनशिप में भाग लेते हुए एक रजत और एक कांस्य पदक प्राप्त किया।जनवरी 2024 में पटाया थाईलैंड में आयोजित थाईलैंड लॉन बॉल ओपन चैंपियनशिप में पुरुष वर्ग का व्यक्तिगत श्रेणी का खिताब जीतकर इतिहास रच दिया।ऐसे करने वाले वो पहले भारतीय भी बने। इन्हीं खेलो में टीम स्पर्धा का कांस्य पदक भी हासिल किया। जून 2024 में वर्ल्ड स्पोर्ट्स ट्रांसप्लांट चैंपियनशिप बैंकॉक खेलो में एक स्वर्ण,एक रजत और एक कांस्य सहित कुल तीन पदक प्राप्त किए।अक्टूबर 2024 के पहले सप्ताह में आयोजित ऑस्ट्रेलियन ट्रांसप्लांट गेम्स में भाग लेकर पेटांक खेल की व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण,युगल स्पर्धा में स्वर्ण और लॉन बॉल की व्यक्तिगत स्पर्धा में भी स्वर्ण पदक हासिल कर अपनी काबिलियत और क्षमता का परिचय दिया। इन खेलो के तुरंत बाद अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में हांगकांग ट्रांसप्लांट खेलो में भाग लिया और तीन रजत और एक कांस्य सहित चार पदक प्राप्त किए।पिछले साल अगस्त 2025 में जर्मनी के ड्रेसडेन शहर मे आयोजित वर्ल्ड ट्रांसप्लांट खेलो में दूसरी बार पुनः भारतीय दल के सदस्य के रूप में भाग लेने का मौका मिला और शेखावत ने पुनः अपनी काबिलियत का परिचय देते हुए पेटांक खेल की व्यक्तिगत स्पर्धा में रजत पदक और युगल प्रतियोगिता में कांस्य पदक हासिल कर पुनः देश के साथ साथ राजस्थान का नाम भी विश्व पटल पर रोशन किया। इस प्रकार इन्होंने पिछले 3 वर्ष में 7 अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेकर कुल 18 पदक प्राप्त किए। ऐसा करने वाले वो भारत के पहले खिलाड़ी है जिन्होंने 18 अंतर्राष्ट्रीय पदक जीते हो।शेखावत की इस उपलब्धि पर राज्य सरकार ने उपखंड स्तर ,जिला स्तर और राज्य स्तर पर सम्मान देकर हौंसला बढ़ाया। साथ ही नर्सिंग क्षेत्र के राज्य के सर्वोच्च सम्मान फ्लोरेंस नाइटेंगल अवार्ड से भी नर्सेज दिवस पर इनको नवाजा गया। शेखावत की यह उपलब्धि हिम्मत न हारने की प्रेरणा देती है जिन्होंने अपने खुद के हौंसले से अपने आत्म बल का उत्तम प्रदर्शन कर विश्व के क्षितिज पर अपनी कामयाबी की पताका फहराई है। दवाब में भी न टूटने और मुश्किलों के आगे न झुकने की एक संघर्ष की गौरव गाथा है।