भाजपा शहरी सरकार झटके के बाद गांव में इम्तिहान की ओर

संजय सोनी
झुंझुनूं (नवयत्न)। पंचायती राज चुनाव की घोषणा के साथ ही जिले की ग्रामीण राजनीति में हलचल तेज हो गई है। भाजपा और कांग्रेस के साथ राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी सहित अन्य राजनीतिक दल भी सक्रिय हो गए हैं। लेकिन इन चुनावों में सबसे ज्यादा नजर सत्ता में बैठी भाजपा के प्रदर्शन पर रहेगी। हालिया शहरी निकाय चुनाव में अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने के बाद भाजपा के सामने अब ग्रामीण क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ और संगठन की ताकत साबित करने की चुनौती है। राज्य में सरकार होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर लगातार सामने आ रहे राजनीतिक झटकों ने भाजपा संगठन के सामने कई सवाल खड़े किए हैं। शहरी निकाय चुनाव के परिणामों को लेकर पार्टी के भीतर भी मंथन की चर्चा रही, लेकिन पंचायत चुनाव की घोषणा के साथ ही संगठन को तत्काल चुनावी मोड में आना पड़ा है। ऐसे में सवाल यह है कि पार्टी शहरी चुनाव से मिले संकेतों से कितना सबक लेकर गांवों में उतरती है। झुंझुनूं जिले में हुए नगर निकाय चुनाव के बाद भाजपा के संगठनात्मक कामकाज, गुटबाजी, टिकट वितरण और स्थानीय नेतृत्व के बीच तालमेल को लेकर चर्चाएं तेज हुई थी। राजनीतिक हलकों में इसे महज उम्मीदवारों की हार-जीत के बजाय संगठन की रणनीति से जोड़कर भी देखा गया। दबी जुबान में यह सवाल भी उठता रहा कि सत्ता और संगठन दोनों की ताकत होने के बावजूद भाजपा स्थानीय चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत क्यों नहीं कर पाई। हालांकि भाजपा समर्थक इसे स्थानीय समीकरणों और उम्मीदवारों के व्यक्तिगत प्रभाव से जोड़ते हैं, लेकिन चुनाव परिणामों ने संगठन के सामने आत्ममंथन की जरूरत जरूर पैदा की है।
जिलाध्यक्ष-विधायक की भूमिका पर निगाहें
अब पंचायत चुनाव में भाजपा जिलाध्यक्ष हर्षिनी कुलहरी और विधायक राजेंद्र भांबू की भूमिका पर भी निगाहें रहेंगी। जून 2025 में जिला संगठन की कमान संभालने के बाद लगभग सवा साल के कार्यकाल में यह चुनाव उनके नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण परीक्षा के रूप में सामने आया है।
भाजपा में पहली बार जाट समुदाय से जिलाध्यक्ष बनाए जाने को लेकर भी उस समय काफी चर्चा हुई थी। अब संगठन के सामने चुनौती यह है कि इस नेतृत्व को गांवों तक किस तरह मजबूत किया जाए और कार्यकर्ताओं को एकजुट कर चुनावी मैदान में उतारा जाए।
गांव बताएंगे संगठन की वास्तविक ताकत
पंचायत चुनावों में समीकरण शहर से अलग होते हैं। यहां प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़, सामाजिक समीकरण, स्थानीय रिश्ते, जातीय संतुलन और गांव स्तर की राजनीति की बड़ी भूमिका रहती है। इसलिए परिणाम का पूरा श्रेय या जिम्मेदारी केवल जिलाध्यक्ष अथवा विधायक के खाते में डालना भी उचित नहीं लेकिन सत्ता संगठन के बाद हार का जिम्मेदार कौन यही बड़ा सवाल उभर रहा है। फिर भी सत्ता में होने के बावजूद यदि भाजपा ग्रामीण क्षेत्रों में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाती है तो संगठन की कार्यशैली और स्थानीय नेतृत्व की रणनीति पर सवाल और गहरे हो सकते हैं। अब कांग्रेस, आरएलपी और अन्य राजनीतिक दल भी गांवों में सक्रिय हो चुके हैं। ऐसे में पंचायती राज चुनाव भाजपा के लिए शहर के झटके के बाद गांव में अपनी साख बचाने और संगठन की वास्तविक पकड़ दिखाने का बड़ा इम्तिहान बन गया है।

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