कभी प्यासे राहगीरों का सहारा था ‘बाबाजी का कुआं, अब खंडहर में तब्दील
निसं
बुगाला (नवयत्न)। कारी-जाखल मार्ग के बीच टीबे पर करीब 65 साल पहले बनाया गया कुआं आज जीर्ण-शीर्ण हालत में है। क्षेत्र के बुजुर्ग इसे आज भी ‘बाबाजी का कुआं नाम से याद करते हैं। कभी यह कुआं राहगीरों, पशुपालकों और पशु-पक्षियों की प्यास बुझाने का प्रमुख केंद्र था। आज यहां सिर्फ पुरानी यादें और खंडहर बचे हैं। बताया जाता है कि करीब वर्ष 1960 में बड़ाऊ निवासी सवाईसिंह राजपूत सलेदी सिंहोत यहां पहुंचे थे। उन्होंने निर्जन टीले पर जांटी के पेड़ के नीचे पर्णकुटी बनाई और धूणा जलाकर साधना शुरू की। वे दिन-रात ‘सीतारामÓ का जाप करते थे। इसी वजह से लोग उन्हें सीताराम बाबा के नाम से पुकारने लगे।
सेवा को बनाया जीवन का उद्देश्य
सीताराम बाबा का जीवन प्यासे राहगीरों, चरवाहों और पशु-पक्षियों की सेवा में बीतता था। श्रद्धालु उनके लिए पानी और खाद्य सामग्री लेकर आते थे। बाबा जरूरतमंदों को भोजन कराते और राहगीरों के लिए रात्रि विश्राम की व्यवस्था भी करते थे। बाबा की सेवा भावना से प्रभावित होकर कारी और जाखल के ग्रामीणों ने मिलकर कुआं निर्माण समिति बनाई। ग्रामीणों से चंदा एकत्र किया गया और स्थानीय लोगों ने श्रमदान कर कुएं का निर्माण कराया। इसके बाद यह स्थान राहगीरों और पशुपालकों के लिए प्रमुख जल केंद्र बन गया। करीब तीन दशक तक इस कुएं से लोगों को जलसेवा मिलती रही।
आज उपेक्षा में है सेवा की यह निशानी
समय बीतने के साथ सीताराम बाबा अपने परिवार के पास लौट गए, जहां बाद में उनका निधन हो गया। आज उनकी पर्णकुटी के निशान भी मिटने लगे हैं और कुआं भी उपेक्षा का शिकार है। कभी प्यासे पथिकों की प्यास बुझाने वाला यह कुआं आज भी अतीत की उस सेवा भावना की कहानी कह रहा है। सीताराम बाबा का जीवन यह संदेश देता है कि सच्ची साधना केवल पूजा-पाठ में नहीं, बल्कि जरूरतमंदों की सेवा में भी है।