बाड़े से बाहर निकले भावी पार्षद, ‘खोखे’ के चक्कर में पार्टी से धोखा!
सुरेंद्र शर्मा
झुंझुनूं (नवयत्न)। नगर परिषद झुंझुनूं के 60 वार्डों में 9 सितंबर को मतदान संपन्न होने के बाद अब चुनावी मुकाबला खत्म होने के बावजूद सियासी घमासान तेज हो गया है। सभापति की कुर्सी तक पहुंचने के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों ने संभावित विजयी पार्षदों की बाड़ाबंदी शुरू कर दी, लेकिन महज एक दिन बाद ही दोनों खेमों में हलचल दिखाई देने लगी। कुछ भावी पार्षद बाड़ाबंदी से बाहर निकलकर अपने घर लौट आए हैं। इसके पीछे निजी कारण बताए जा रहे हैं, लेकिन सियासी गलियारों में इसके अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं।
नगर परिषद के 60 वार्डों में सभापति बनाने के लिए 31 पार्षदों का जादुई आंकड़ा जरूरी है। चुनाव परिणाम आने से पहले दोनों प्रमुख दल इस आंकड़े से दूर दिखाई दे रहे हैं। राजनीतिक जानकारों की मानें तो भाजपा के लिए 31 का आंकड़ा हासिल करना कांग्रेस की तुलना में ज्यादा चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है, जबकि कांग्रेस इसके अपेक्षाकृत करीब बताई जा रही है। ऐसे में निर्दलीय पार्षद दोनों दलों के लिए सत्ता की चाबी साबित हो सकते हैं।
भाजपा की बाड़ाबंदी में विधायक भाम्बू की कमान
गुरुवार को भाजपा की ओर से संभावित विजयी पार्षदों को बसों और निजी वाहनों के जरिए अज्ञात स्थान पर ले जाने की चर्चा रही। माना जा रहा है कि स्थानीय विधायक राजेंद्र सिंह भाम्बू के नेतृत्व में पार्टी अपने संभावित पार्षदों को एकजुट रखने की रणनीति पर काम कर रही है।
हालांकि शनिवार को भाजपा की बाड़ाबंदी से कुछ भावी पार्षद वापस अपने घर पहुंच गए। इन पार्षदों से जब घर लौटने का कारण जानने का प्रयास किया गया तो किसी ने निजी आवश्यकता, किसी ने उम्र अथवा स्वास्थ्य संबंधी वजह बताई, जबकि कुछ ने दैनिक कार्यों का हवाला दिया। राजनीतिक कारणों पर खुलकर बोलने से अधिकांश ने दूरी बनाए रखी।
‘दामाद’ के मुद्दे पर खेमे में तकरार की चर्चा
भाजपा खेमे से जुड़े सूत्रों के अनुसार बाड़ाबंदी के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा वार्ड 49 से भाजपा प्रत्याशी और विधायक राजेंद्र सिंह भाम्बू के दामाद मनु धनकड़ को लेकर रही। पार्टी के भीतर दामाद को लेकर पहले से चल रही राजनीतिक चर्चा के बीच अब सभापति चुनाव के संभावित समीकरणों को लेकर भी तकरार की बात सामने आ रही है।
सूत्रों का दावा है कि भाजपा खेमे के एक भावी पार्षद ने किसी निर्दलीय के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास किया, जिससे असहज स्थिति बनी और इसके बाद बाड़ाबंदी से बाहर आने की स्थिति बनी। हालांकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
कांग्रेस को निर्दलीयों की बैसाखी का सहारा
दूसरी ओर कांग्रेस ने भी शुक्रवार को अपने संभावित विजयी पार्षदों के साथ-साथ उन निर्दलीय प्रत्याशियों पर भी नजर रखी, जिनके जीतने की संभावना मानी जा रही है। कांग्रेस खेमे से जुड़े संभावित पार्षदों और निर्दलीयों को भी अज्ञात स्थान पर ले जाने की चर्चा रही।
लेकिन शनिवार को कांग्रेस खेमे से जुड़े कुछ भावी पार्षद और निर्दलीय भी वापस झुंझुनूं पहुंच गए। सूत्रों के मुताबिक सभापति चुनाव में अपनी पसंद के उम्मीदवार को समर्थन देने की बात को लेकर कुछ पार्षदों ने अपनी स्थिति स्पष्ट रखने की कोशिश की है।
सोशल मीडिया की खबरों ने बढ़ाई बेचैनी
बाड़ाबंदी के बीच सोशल मीडिया पर लगातार चल रही खबरों और राजनीतिक दावों ने भावी पार्षदों की बेचैनी बढ़ा दी है। सूत्रों के अनुसार कुछ पार्षदों को जब अपने-अपने खेमों में संभावित समीकरण बदलते नजर आए तो उन्होंने वापस अपने वार्डों में लौटना ही बेहतर समझा।
हालांकि पार्षदों की ओर से इसे निजी कारण बताया जा रहा है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इन वापसी को सभापति चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल—वोट किसका, सौदा किसका?
बाड़ाबंदी और संभावित खरीद-फरोख्त की चर्चाओं के बीच अब सबसे बड़ा सवाल आम मतदाता के बीच उठ रहा है। कई वार्डों के लोगों का कहना है कि उन्होंने पार्षद को सड़क, नाली, सफाई, रोशनी और अन्य मूलभूत सुविधाओं के लिए वोट दिया है। यदि चुनाव जीतने के बाद वही पार्षद किसी राजनीतिक सौदे के आधार पर सभापति के पक्ष में मतदान करता है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर मतदाता के वोट की कीमत क्या रह गई?
राजनीतिक गलियारों में पार्षदों की संभावित खरीद-फरोख्त को लेकर ‘खोखे’ यानी (एक करोड़ ) बड़ी रकम की चर्चाएं भी चल रही हैं। हालांकि किसी पार्षद के बिकने या किसी को रकम दिए जाने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में यह चर्चा फिलहाल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और अटकलों तक ही सीमित है।
14 सितंबर को खुलेगा जीत और हार का राज
कौन प्रत्याशी अपने वार्ड से जीत दर्ज करता है, कितने मतों से जीतता है और किस पार्टी को कितनी सीटें मिलती हैं, इन सभी सवालों का जवाब 14 सितंबर को मतगणना के बाद मिलेगा। माना जा रहा है कि सुबह करीब 11 बजे तक नगर परिषद के अधिकांश वार्डों की तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाएगी और इसके साथ ही सभापति पद के लिए वास्तविक सियासी गणित भी सामने आने लगेगा।
13 सितंबर की रात फिर हो सकती है बाड़ाबंदी
राजनीतिक सूत्रों की मानें तो 14 सितंबर को परिणाम आने से पहले दोनों प्रमुख दल 13 सितंबर की रात एक बार फिर अपने-अपने संभावित पार्षदों की बाड़ाबंदी कर सकते हैं। इसके लिए दोनों दलों के रणनीतिकार अपने-अपने स्तर पर समीकरण साधने में जुटे हुए हैं।
अब देखना यह है कि 31 के जादुई आंकड़े तक कौन पहुंचता है और किसे निर्दलीयों की बैसाखी का सहारा लेना पड़ता है। फिलहाल चुनाव परिणाम से ज्यादा चर्चा इस बात की है कि भावी पार्षद किस खेमे में रहते हैं, कौन किसके साथ जाता है और सभापति की कुर्सी तक पहुंचने के लिए किसकी रणनीति कामयाब होती है।