निष्कलंक, निष्कपट और निर्भीक पत्रकारिता के प्रतीक नारायण बारेठ

 

 

सीकर (नवयत्न)। निष्कलंक, निष्कपट और निर्भीक पत्रकारिता को जीवनभर जीने वाले वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ आज भले ही हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी जीवटता से भरी पत्रकारिता ख़बरनवीसों की दुनिया में हमेशा जीवित रहेगी।

 

कलम के जादूगर बारेठ जी से मेरा संबंध तीन दशक से भी अधिक समय तक रहा। वर्ष 2000 में सीकर में पत्रकारों के संगठन “सीकर जिला पत्रकार सोसायटी” का गठन हुआ। उस समय मैंने उन्हें शपथ ग्रहण समारोह में आने का निमंत्रण दिया। उन्होंने सहजता से इसे स्वीकार किया। इसके बाद 21 मार्च 2001 को सोसायटी द्वारा आयोजित राज्य स्तरीय पत्रकार सम्मेलन में भी उन्होंने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई।

 

इन कार्यक्रमों के बाद उनका सीकर आना-जाना लगातार बना रहा। वे केवल एक सशक्त कलमकार ही नहीं, बल्कि उच्च कोटि के वक्ता भी थे। देश-विदेश की राजनीति के साथ-साथ सामाजिक समरसता पर उनके विचार आमजन को बेहद प्रभावित करते थे।

 

नारायण जी का सादगी भरा जीवन और प्रेरणादायक व्यक्तित्व ऐसा था कि जो भी उनसे मिलता, उनका मुरीद हो जाता। राजस्थान की राजनीति और पत्रकारिता के रिश्तों की जब भी चर्चा होगी, तब अशोक गहलोत और नारायण बारेठ के बीच का अपनापन एक मिसाल के रूप में याद किया जाएगा।

 

आज के दौर में जहां कई बार पत्रकार एक-दूसरे को देखना भी पसंद नहीं करते, वहीं एक समय ऐसा भी था जब पत्रकारिता में आपसी सम्मान और संवेदना की मिसालें देखने को मिलती थीं। एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यात्रा को कवर करने के लिए वे सवाई माधोपुर जा रहे थे। इसी दौरान वे एक दुर्घटना में घायल हो गए और लंबे समय तक स्वास्थ्य लाभ लेते रहे।

उस दौरान कुछ पत्रकार बीबीसी से जुड़ने की इच्छा लेकर भारत में बीबीसी के पूर्व प्रमुख संज़ीव श्रीवास्तव के पास पहुंचे। लेकिन उन्होंने वह दरियादिली दिखाई, जो आज भी एक मिसाल है। उन्होंने साफ कहा कि जब तक नारायण बारेठ स्वस्थ होकर वापस नहीं आते, तब तक उनका स्थान वही रहेगा। उन्होंने नए लोगों को अवसर देने के बजाय बारेठ जी के प्रति अपनी निष्ठा और सम्मान को प्राथमिकता दी।

 

नारायण जी के जीवन के ऐसे अनेक किस्से हैं,जो पत्रकारिता से जुड़े लोगों को बहुत कुछ सिखा सकते हैं। नए पत्रकारों को उनके जीवन के बारे में अवश्य जानना चाहिए, ताकि वे समझ सकें कि चमक-दमक से दूर रहकर भी संघर्ष और सादगी के दौर में खुद को कुंदन कैसे बनाया जाता है।

निस्संदेह, पत्रकारिता करने वालों के लिए नारायण बारेठ सदैव एक प्रेरणा-पुंज बने रहेंगे.

 

लेखक – बाल मुकुंद जोशी, सीकर 

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