लोग क्या कहेंगे से बचने की बाड़ाबंदी, बोर्ड बना तो सवाल और भी होंगे!

सुरेंद्र शर्मा 

झुंझुनू (नवयत्न)। नगर परिषद झुंझुनू के चुनाव परिणाम सामने आने के बाद मंगलवार को जिला मुख्यालय पर दिनभर चुनावी चर्चा का बाजार गर्म रहा। बाजार से लेकर राजनीतिक गलियारों तक एक ही सवाल सुनाई दिया कौन बनेगा सभापति? भाजपा बोर्ड बनाएगी या कांग्रेस? निर्दलीय किसका साथ देंगे? पार्टी के चुनाव चिन्ह पर जीतकर आए पार्षद अपनी निष्ठा पर कायम रहेंगे या सत्ता के खेल में समीकरण बदलेंगे? यही सवाल दिनभर जनचर्चा के केंद्र में रहे।

60 वार्ड वाली नगर परिषद में बहुमत का जादुई आंकड़ा 31 है। परिणामों में कांग्रेस के 30 पार्षद निर्वाचित हुए हैं, जबकि भाजपा और निर्दलीय प्रत्याशियों ने 15-15 सीटें जीती हैं। यानी कांग्रेस बहुमत से महज एक कदम दूर है, जबकि भाजपा को बोर्ड बनाने के लिए अपने 15 पार्षदों के अलावा 16 और पार्षदों के समर्थन की जरूरत होगी। भाजपा और निर्दलीयों की संख्या जोड़ने पर आंकड़ा 30 ही होता है, जो कांग्रेस के बराबर है, लेकिन बहुमत के लिए दोनों ही खेमे एक-एक सीट पीछे हैं।

 

भाजपा, 15 पर सिमटी अब 16 की तलाश क्यों?

 

भाजपा ने 60 में से 41 वार्डों में ही प्रत्याशी उतारे थे, जबकि 19 वार्डों में पार्टी का प्रत्याशी नहीं था। कांग्रेस ने 51 वार्डों में चुनाव लड़ा और 9 वार्डों में प्रत्याशी नहीं उतार सकी। चुनाव परिणाम ने अब दोनों दलों के सामने अलग-अलग राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। कांग्रेस 30 सीटों के साथ बहुमत के बिल्कुल करीब है, वहीं भाजपा 15 सीटों के साथ सत्ता की दौड़ में बने रहने के लिए निर्दलीयों पर निर्भर साथ में एक कांग्रेसी पार्षद की अदद जरूरत।

 

यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है

 

क्या 15 पार्षदों वाली भाजपा 31 का आंकड़ा छूने के लिए 16 अन्य पार्षदों को अपने पाले में लाएगी? यदि ऐसा होता है तो यह केवल झुंझुनू नगर परिषद का स्थानीय राजनीतिक घटनाक्रम नहीं रहेगा, बल्कि प्रदेश की राजनीति में भी इसकी चर्चा होना तय है।

 

बाड़ाबंदी या ‘हमने भी कोशिश की थी’ कवायद

 

राजनीतिक गलियारों में भाजपा की ओर से संभावित पार्षदों की बाड़ाबंदी की चर्चा तेज है। इसे लेकर जनचर्चा में एक और सवाल तैर रहा है क्या यह वास्तव में बोर्ड बनाने की गंभीर कवायद है या फिर भविष्य में उठने वाले सवालों से बचने की राजनीतिक तैयारी?

यानी यदि भाजपा बोर्ड नहीं बना पाती है तो यह कहा जा सके कि पार्टी ने प्रयास ही नहीं किया, इसलिए संभावित पार्षदों को साथ रखने और बाड़ाबंदी की कवायद दिखाई जा रही है। लेकिन यदि बोर्ड बन गया तो सवाल और बड़ा होगा 15 से 31 का सफर आखिर कैसे पूरा हुआ?

 

16 पार्षद साथ आए और क्यों और कैसे आए?

 

चुनाव के बाद शहर में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कोई संभावित पार्षदों के साथ जाने की बात कर रहा है तो कोई कथित खरीद-फरोख्त और प्रलोभन की अफवाहों को हवा दे रहा है। हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक माहौल में यह सवाल जरूर गंभीर है कि यदि भाजपा बोर्ड बनाती है तो उसके पास बहुमत का आंकड़ा पूरा करने के लिए आने वाले अतिरिक्त पार्षद कौन होंगे और वे किन परिस्थितियों में उसके साथ आएंगे।

राजनीति में समर्थन लेना अलग बात है, लेकिन यदि जनता के बीच यह धारणा बनती है कि निर्वाचित पार्षदों की ‘बोली’ लगी, तो इसका राजनीतिक संदेश उससे कहीं बड़ा हो सकता है।

 

 

जनादेश 30 का, बोर्ड 15 वालों का तो सवाल जनता भी पूछेगी

 

सबसे अहम सवाल यही है कि जनता ने जिस दल को 30 पार्षदों का जनादेश दिया, वह बोर्ड बनाने से बाहर रह जाए और 15 पार्षदों वाली पार्टी 16 अन्य के समर्थन से बोर्ड बना ले, तो लोकतांत्रिक जनादेश की व्याख्या किस तरह की जाएगी?

यहां मुद्दा केवल सभापति की कुर्सी का नहीं, बल्कि जनादेश की मर्यादा और राजनीतिक नैतिकता का भी है। निर्दलीय पार्षदों का समर्थन लेना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन यदि समर्थन के पीछे किसी प्रकार के आर्थिक प्रलोभन या सौदेबाजी की चर्चा सामने आती है तो सवाल निश्चित रूप से उठेंगे।

 

सभापति की कुर्सी कितनी बड़ी

 

नगर परिषद का सभापति पद केवल एक पद नहीं, बल्कि शहर की राजनीतिक दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। यही वजह है कि 15 और 30 के आंकड़ों के बावजूद दोनों प्रमुख दल सत्ता की चाबी अपने हाथ में लेने की कोशिश में जुटे हैं और निर्दलीय पार्षद अचानक सबसे महत्वपूर्ण भूमिका में आ गए हैं।

झुंझुनू में अब असली मुकाबला चुनाव खत्म होने के बाद शुरू हुआ है। जनता ने पार्षद चुन दिए, अब पार्षद किसे चुनते हैं यही आने वाले दिनों की सबसे बड़ी राजनीतिक कहानी होगी। यदि 15 पार्षदों वाली भाजपा 31 का आंकड़ा हासिल कर बोर्ड बना लेती है, तो सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा 16 पार्षद कहां से आए?’ इस सवाल का जवाब जितना स्पष्ट होगा, बोर्ड की राजनीतिक स्वीकार्यता उतनी ही मजबूत होगी।

 

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