एस एस मोदी में तीन दिवसीय शिक्षण प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन
सुरेन्द्र शर्मा
झुंझुनू (नवयत्न)। जिला मुख्यालय स्थित एस एस मोदी विद्या विहार में 22 से 24 जून तक तीन दिवसीय शिक्षण प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि हार्टफुलनेस मेडिटेशन के तेजपाल शेखावत के कर कमलों द्वारा बुद्धि प्रदाता भगवान गणेश व ज्ञानदायिनी माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन कर हुआ। विद्यालय समन्वयक मनीष अग्रवाल, अकादमिक निदेशक रॉय सी पॉल व प्राचार्य विजय मसीह ने मुख्य वक्ता हार्टफुलनेस मेडिटेशन के श्रद्धेय अर्जुनदास महाराज, तेजपाल शेखावत, शिक्षा विशेषज्ञ, स्पीकर एवं शिक्षा नवप्रवर्तक अभिनव सिंघल व कुंती सिंघल, ट्रस्टी डालमिया विद्या मंदिर एवं आध्यात्मिक चिंतक पराग डालमिया का पुष्प गुच्छ भेंट कर अभिनंदन किया।
शिक्षकों के लिए अध्यात्म, प्रोजेक्ट आधारित एवं अनुभवात्मक शिक्षण, विद्यालयी पाठ्यक्रम में श्रीमद्भगवद्गीता की प्रासंगिकता, डिजिटल युग में विद्यार्थियों की सहभागिता बढ़ाने की रणनीतियाँ, आत्मविश्वासी एवं प्रेरणादायी शिक्षक का व्यक्तित्व, आलोचनात्मक चिंतन कौशल तथा सूचना प्रौद्योगिकी एवं कंप्यूटर कौशल जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर प्रशिक्षण एवं सेमिनार आयोजित किए गए। ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद विद्यालय स्टाफ में नई ऊर्जा का संचार करना व नई शिक्षा नीति के अनुरूप बच्चों में कुछ नया सीखने की चाह पैदा करना, नैतिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा प्रदान करना, शिक्षकों के ज्ञान, कौशल एवं शिक्षण दक्षताओं को आधुनिक समय की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करना इस कार्यक्रम का उद्देश्य रहा। इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य शिक्षा संबंधी समस्याओं में सुधार लाना है।
कार्यक्रम में प्राप्त अनुभव एवं सीख शिक्षकों को अपने कक्षा शिक्षण को और अधिक प्रभावी, रोचक एवं विद्यार्थी-केंद्रित बनाने में सहायक सिद्ध होंगे। हार्टफुलनेस मेडिटेशन के तेजपाल शेखावत ने प्रथम दिन के पहले सत्र में जीवन में काम आने वाली बहुत ही महत्तवपूर्ण बातें बताई। बच्चों में शिक्षा बहुत है संस्कार नहीं है। जैसे हम स्वयं का सम्मान चाहते है वैसे ही दूसरों को सम्मान देना सीखें। आप कर्ता मत बने, सहज भाव से कर्म करें। आत्मसंतुष्टि उसे ही मिलेगी जो अपना कार्य ईमानदारी से करेगा। उन्होंने कहा बच्चे उदंड होते हैं उनमें चंचलता होती है आप उन्हें अच्छे संस्कार दीजिए। अच्छा व्यक्ति अपना प्रभाव सब पर छोड़ता है। बच्चों को प्रोत्साहित करके उन्हें सही रास्ता दिखाना एक शिक्षक का कर्तव्य है। ईमानदारी व प्रेम से सबका दिल जीता जा सकता है। हमारी मनोकामना ही दु:खों का कारण हैं।
अहंकार व आलस्य मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं इनका त्याग कर के ही जीवन को सहज बनाया जा सकता है। क्रोध पर नियंत्रण रखें जैसे हम बच्चे को अबोध जानकर माफ कर देते हैं उसी प्रकार सामने वाले क्रोधी को माफ कर दें। ज्ञान का दीपक जलाकर अज्ञानता को दूर किया जा सकता है। एक शिक्षक को तनाव मुक्त रहकर अपने काम से प्रेम करना चाहिए। बच्चों को समझने का प्रयास करते हुए उन्हें अध्यात्म से जोड़े। प्रकृति का अनुसरण करें और संयम से जीवनयापन करें। दूसरे दिन के प्रथम सत्र में तेजपाल शेखावत द्वारा मेडिटेसन पर विशेष सत्र का आयोजन किया गया। लगभग एक घंटे तक चले इस सत्र में उपस्थित शिक्षकों को विभिन्न ध्यान तकनीकों का अभ्यास करवाया गया।
शेखावत ने बताया कि ध्यान मानसिक शांति, आत्म-जागरूकता और एकाग्रता बढ़ाने का प्रभावी माध्यम है। उन्होंने कहा कि शिक्षक अपने दैनिक जीवन में ध्यान को अपनाकर तनाव को कम कर सकते हैं तथा अधिक सकारात्मक और ऊर्जावान तरीके से अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकते हैं। सत्र के दौरान सभी शिक्षकों ने ध्यान अभ्यास में उत्साहपूर्वक भाग लिया। शांत एवं सकारात्मक वातावरण में कराए गए ध्यान अभ्यास से प्रतिभागियों ने मानसिक शांति, आत्मविश्वास और नई ऊर्जा का अनुभव किया। अंत में नियमित ध्यान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने इसे स्वस्थ एवं संतुलित जीवनशैली का आवश्यक अंग बताया।
इसी शृंखला में ध्यान सत्र के पश्चात विद्यालय के संगीत शिक्षक आत्माराम जांगिड़ व अजेेन्द्र ने संगीतमय सुंदरकांड पाठ का आयोजन किया। सभी शिक्षकों एवं स्टाफ सदस्यों ने श्रद्धा और भक्ति भाव से सुंदरकांड पाठ में सहभागिता की। पाठ के दौरान विद्यालय परिसर भक्तिमय वातावरण से गुंजायमान रहा तथा सभी ने आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव किया। कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित सभी कर्मचारियों ने प्रसाद ग्रहण किया तथा विद्यालय परिवार ने सुख, शांति एवं समृद्धि की कामना की।
दूसरे दिन के द्वितीय सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए अपने उद्बोधन में श्रीयुत डालमिया ने कहा कि भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि जीवन प्रबंधन, नेतृत्व विकास, तनाव नियंत्रण तथा नैतिक मूल्यों की स्थापना का प्रभावी मार्गदर्शक है। उन्होंने बताया कि यदि गीता के सिद्धांतों को विद्यालयी वातावरण में व्यवहारिक रूप से अपनाया जाए तो विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, भावनात्मक संतुलन, निर्णय क्षमता तथा जिम्मेदारी की भावना का विकास किया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल अकादमिक उपलब्धियाँ प्राप्त करना नहीं बल्कि विद्यार्थियों को चरित्रवान, संवेदनशील एवं मूल्यनिष्ठ नागरिक बनाना भी है। उन्होंने कर्मयोग, आत्म-अनुशासन, सकारात्मक सोच तथा कर्तव्यनिष्ठा जैसे गीता के मूल संदेशों को शिक्षण प्रक्रिया से जोडऩे के विभिन्न व्यावहारिक उपाय साझा किए। उनके प्रेरक एवं चिंतनपरक विचारों ने उपस्थित शिक्षकों को शिक्षा के व्यापक उद्देश्य और विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास की दिशा में नई दृष्टि प्रदान की।
तीसरे दिन के प्रथम सत्र में अर्जुनदास महाराज ने अपने उद्बोधन जीवन में काम आने वाली बहुत ही महत्तवपूर्ण बातें बताई। बच्चों में शिक्षा बहुत है संस्कार नहीं है। जैसे हम स्वयं का सम्मान चाहते है वैसे ही दूसरों को सम्मान देना सीखें। आप कर्ता मत बने, सहज भाव से कर्म करें। आत्मसंतुष्टि उसे ही मिलेगी जो अपना कार्य ईमानदारी से करेगा।
उन्होंने कहा बच्चे उदंड होते हैं उनमें चंचलता होती है आप उन्हें अच्छे संस्कार दीजिए। अच्छा व्यक्ति अपना प्रभाव सब पर छोड़ता है। अहंकार व आलस्य मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं इनका त्याग कर के ही जीवन को सहज बनाया जा सकता है। क्रोध पर नियंत्रण रखें जैसे हम बच्चे को अबोध जानकर माफ कर देते हैं उसी प्रकार सामने वाले क्रोधी को माफ कर दें। एक शिक्षक को तनाव मुक्त रहकर अपने काम से प्रेम करना चाहिए। बच्चों को समझने का प्रयास करते हुए उन्हें अध्यात्म से जोड़े। प्रकृति का अनुसरण करें और संयम से जीवनयापन करें।
तीसरे दिन के द्वितीय सत्र में प्रशिक्षण आयोजित किया गया। इस सत्र में विद्यालय शिक्षक अनिल शर्मा, मनोज सुनिया व पूनम ने शिक्षकों को डिजिटल युग में विद्यार्थियों को पढ़ाई से जोडऩे के प्रभावी तरीकों की जानकारी दी। आज के विद्यार्थी इंटरनेट, मोबाइल और सोशल मीडिया के बीच बड़े हो रहे हैं। ऐसे में शिक्षकों को भी समय के साथ अपनी शिक्षण पद्धतियों में बदलाव लाना होगा। उन्होंने बताया कि शिक्षक केवल पढ़ाने वाले नहीं बल्कि विद्यार्थियों के मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत भी हैं।
सत्र के दौरान डिजिटल साधनों के उपयोग, समूह गतिविधियों, प्रोजेक्ट आधारित शिक्षण, प्रश्नोत्तरी, कहानी कथन तथा विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी बढ़ाने वाली विभिन्न शिक्षण तकनीकों पर चर्चा की गई। इन तरीकों से कक्षा शिक्षण अधिक रोचक बनता है और विद्यार्थियों में रचनात्मकता, आत्मविश्वास, संवाद कौशल तथा समस्या समाधान की क्षमता विकसित होती है। यह भी बताया कि तकनीक का उपयोग केवल साधन के रूप में किया जाना चाहिए। शिक्षक और विद्यार्थी के बीच अच्छा संवाद तथा मानवीय जुड़ाव ही प्रभावी शिक्षा की सबसे बड़ी शक्ति है।
अपने वक्तव्य में एनी मसीह ने कहा कि एक शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं होता बल्कि वह विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक सफल शिक्षक में आत्मविश्वास, सकारात्मक सोच, संवेदनशीलता और विद्यार्थियों को प्रेरित करने की क्षमता होना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि शिक्षक का व्यवहार, संवाद शैली और विद्यार्थियों के प्रति उसका दृष्टिकोण उनके सीखने और विकास पर गहरा प्रभाव डालता है। विद्यार्थियों की भावनाओं को समझना, उनकी समस्याओं को सुनना तथा उन्हें सही दिशा देना एक अच्छे मार्गदर्शक की पहचान है।
उन्होंने शिक्षकों को विद्यार्थियों के साथ विश्वासपूर्ण संबंध स्थापित करने तथा कक्षा में सकारात्मक एवं सहयोगात्मक वातावरण बनाने के लिए प्रेरित किया। प्रशिक्षण के दौरान प्रभावी संवाद, आत्मविश्वास का विकास, नेतृत्व क्षमता, सहानुभूति तथा प्रेरणादायी शिक्षण के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई। उपस्थित शिक्षकों ने भी अपने अनुभव साझा किए और गतिविधियों में उत्साहपूर्वक भाग लिया। बच्चों के सवालों का जवाब देना जरूरी होता है हमें उनकी समस्याओं को समझकर उनका समाधान करना चाहिए। किसी भी तरह पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर बच्चों के आत्मविश्वास को कम न करें।
देश के भविष्य का निर्माता एक शिक्षक ही है। बच्चों को जीवन जीने की सही कला सिखा सकें यही एक शिक्षक का काम है। विद्यालय समन्वयक मनीष अग्रवाल ने कहा कि नवीनतम अंतर्दृष्टि और रणनीतियों के साथ शिक्षकों को सशक्त बनाकर, प्रबंधन यह सुनिश्चित करता है कि शिक्षक अपने छात्रों को शैक्षणिक सफलता और व्यक्तिगत विकास की यात्रा पर मार्गदर्शन करने के लिए अच्छी तरह से सुसज्जित हैं। यह सकारात्मक दृष्टिकोण न केवल शिक्षण स्टाफ को लाभान्वित करता है बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह उनकी देखरेख में प्रत्येक छात्र के समग्र कल्याण और विकास में योगदान देता है।
प्राचार्य विजय मसीह ने शिक्षण उद्देश्य व कक्षा प्रबंधन संबंधित विस्तृत जानकारी विद्यालय स्टाफ को दी। इस कार्यक्रम के माध्यम से बच्चों से जुड़ी छोटी-छोटी बातों को बारीकियों से समझाया। इन तीन दिनों में विद्यालय स्टाफ ने नई-नई तकनीकों व बच्चों से जुड़ी समस्याओं व उनके समाधान की जानकारी ली। प्राचार्य के मार्गदर्शन में सबने जाना कि हर बच्चे में कोई न कोई प्रतिभा अवश्य होती है। हमें सिर्फ उसे तराशने की कोशिश करनी चाहिए।
अकादमिक निदेशक रॉय सी पॉल ने कार्यक्रम के समापन पर कहा कि ऐसे कार्यक्रम न केवल एक शिक्षक के विकास के लिए बल्कि छात्र के हित के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जब तक हम बच्चों के मन में जिज्ञासा पैदा नहीं करेंगे तब तक वे सीख नहीं पायेंगे। एक अच्छा शिक्षक बच्चों को प्रोत्साहित करता है। समय की माँग को देखते हुए ऐसे आयोजन जरूरी है ताकि नयी-नयी जानकारी हासिल की जा सके। उन्होंने अध्यापकों को शपथ दिलाई कि नकारात्मकता का त्याग करके बच्चों के सर्वांगिण विकास के लिए मिल-जुलकर काम करें। जो नई-नई जानकारियाँ ली हैं उनसे बच्चों को लाभान्वित करें।
विद्यालय समन्वयक मनीष अग्रवाल ने कार्यक्रम के मुख्य वक्ता अर्जुनदास महाराज, तेजपाल शेखावत, अभिनव सिंघल व कुंती सिंघल, आध्यात्मिक चिंतक पराग डालमिया को जीवन उपयोगी बातें बताने, शिक्षण तकनीकियों और मनोवैज्ञानिक तरीकों के बारे में जानकारी के लिए आभार व्यक्त किया और विद्यालय परिवार की ओर से स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया। मुम्बई प्रवासी ट्रस्टी शशिकांत मोदी, गीलूराम मोदी, सौरभ मोदी, प्रियंक मोदी व कनिका मोदी ने कार्यक्रम के सफल समापन पर शुभकामनाएँ प्रेषित की।