बगावत के डर से टिकट अटके, जनता ने कहा—वोट हमारा, फैसला हमारा

सपना शर्मा

झुंझुनूं (नवयत्न)। नगर निकाय चुनाव को लेकर भाजपा और कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दलों की ओर से रविवार शाम खबर लिखे जाने तक पार्षद प्रत्याशियों की अधिकृत सूची जारी नहीं होने से राजनीतिक हलचल तेज हो गई। टिकट के दावेदार बेसब्री से सूची का इंतजार कर रहे हैं, वहीं पार्टियों के भीतर संभावित बगावत को लेकर भी मंथन का दौर जारी है। टिकट की घोषणा में देरी को इसी आशंका से जोड़कर देखा जा रहा है।

दूसरी ओर शहर के वार्डों में मतदाताओं की चर्चाओं ने राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा दी है। कई वार्डों में लोगों का कहना है कि पार्टी टिकट दे सकती है, लेकिन वोट तो वार्ड के लोग ही देंगे। ऐसे में पार्टी का चुनाव चिन्ह ही जीत की गारंटी नहीं है। प्रत्याशी का व्यक्तिगत व्यवहार, लोगों से संपर्क और वार्ड के प्रति उसकी सक्रियता इस चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

 

‘यह एमएलए – एमपीनहीं, वार्ड का चुनाव है’

 

कई वार्डों में मतदाताओं के बीच यह बात प्रमुखता से सामने आ रही है कि यह विधानसभा या लोकसभा का चुनाव नहीं है। यह सीधे वार्ड से जुड़ा चुनाव है और वार्ड के लोग आपस में विचार कर तय कर सकते हैं कि उनके बीच कौन लगातार रहा है और कौन आगे भी उनके काम आ सकता है।

यही वजह है कि टिकट की घोषणा से पहले ही कई वार्डों में संभावित प्रत्याशियों को लेकर चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं। कहीं नए चेहरे को मौका देने की बात हो रही है तो कहीं पुराने चेहरों के कामकाज का हिसाब-किताब लगाया जा रहा है।

 

बार-बार आजमाया, उन्होंने क्या किया?

 

कुछ वार्डों में पुराने पार्षदों अथवा पहले चुनाव लड़ चुके चेहरों को लेकर भी नाराजगी सुनने को मिल रही है। मतदाताओं का सवाल है कि जिन्हें बार-बार मौका दिया गया और वे अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाए, उन्हें फिर मौका देने से क्या बदलाव आएगा?

ऐसे में इस बार कई मतदाता पार्टी की पसंद से ज्यादा अपनी पसंद के प्रत्याशी को प्राथमिकता देने की बात कर रहे हैं। इससे दोनों प्रमुख दलों के लिए टिकट वितरण के बाद पैदा होने वाली स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है।

 

सभापति की राजनीति पर भी वार्डों में चर्चा

 

चुनावी चर्चाओं में सभापति पद को लेकर संभावित जोड़-तोड़ भी पीछे नहीं है। एक-दो वार्डों में जागरूक मतदाताओं ने तो यहां तक कहा कि यदि कोई व्यक्ति पार्षद बनकर बाद में धन-बल के सहारे अपनी पसंद का सभापति बनाने-बनवाने की रणनीति के साथ चुनाव मैदान में उतर रहा है तो संभव है कि जनता उसे वार्ड से ही बाहर का रास्ता दिखा दे।

हालांकि यह अभी वार्ड स्तर की चर्चाएं हैं, लेकिन इनसे इतना संकेत जरूर मिल रहा है कि मतदाता इस बार केवल पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह के आधार पर निर्णय लेने के बजाय प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि और उसके कामकाज को भी कसौटी पर कसने के मूड में हैं।

 

सूची जारी और सामने होगी असली तस्वीर

 

भाजपा और कांग्रेस की अधिकृत सूची जारी होने के बाद चुनावी तस्वीर और स्पष्ट होगी। टिकट से वंचित दावेदारों में कितने पार्टी के फैसले को स्वीकार करते हैं और कितने निर्दलीय या अन्य विकल्प के रूप में मैदान में उतरते हैं, यह आने वाले दिनों में सामने आएगा।

फिलहाल झुंझुनूं के राजनीतिक माहौल में सबसे बड़ा सवाल यही है कि पार्टियां किसे टिकट देती हैं और वार्ड की जनता किसे अपना वोट देती है। टिकट पार्टियों के हाथ में जरूर है, लेकिन जीत का अंतिम फैसला मतदाता के हाथ में ही रहेगा।

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