दस्तवेजों के अभाव में दो मासूमों को नहीं मिल रही टीबी की दवा
अमित प्रजापत
सुजानगढ़ (नवयत्न) । सुजानगढ़ के निकटवर्ती गांव बडाबर में दो बच्चों की काफी दयनीय स्थिति है, लेकिन फिर भी प्रशासन की कोई मदद इन बच्चों तक नहीं पहुंच रही। दरअसल ढाई वर्ष के मुकेश, 8 वर्षीय माया नायक के माता-पिता दोनों की टीबी नामक बीमारी से मृत्यु हो चुकी है। साथ ही उनके एक भाई विनोद की भी टीबी से मृत्यु हो चुकी है। वर्तमान में दोनों बच्चे टीबी से ग्रसित हैं, लेकिन इनको किसी भी प्रकार की सरकारी दवाइयां नहीं मिल रही है। बच्चों का लालन-पालन कर रही रिश्तेदार भंवरी देवी ने बताया कि बच्चों के माता-पिता की मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं बन रहे हैं। साथ ही इनके आधार कार्ड, जन आधार कार्ड नहीं बन रहे हैं, जिसके चलते न तो इन बच्चों की सरकारी अस्पताल में पर्ची कटती है और न ही ही इनको दवाई दी जाती है और न ही शाला में एडमिशन होता है। दूसरी ओर टीबी से ग्रसित दोनों बच्चों की सुध लेने पहुंची सामाजिक कार्यकर्ता अमृता चैधरी ने प्रशासन से मांग की है कि इन दोनों बच्चों के समस्त दस्तावेज बनाकर इनको समस्त सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जावे तथा इन बच्चों के पिता के नाम जो भी खेत जमीन थी, उसे इन बच्चों के नाम की जावे, क्योंकि कुछ लोगों जमीन पर बुरी नजर है। वहीं भंवरी देवी ने बताया कि मेरे पति खुद बरसों से बीमार पड़े हैं, इसलिए परिवार को खाने तक के लाले पड़ रहे हैं। भंवरी देवी ने बताया कि बच्चों के दस्तावेज नहीं बनने के कारण हर स्तर पर उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। हाल ही में एडीएम व एसडीएम को मामले से अवगत करवाया गया था। सामाजिक कार्यकर्ता अमृता चैधरी ने प्रशासन से गुहार लगाई है कि इस प्रकार की दयनीय स्थिति वाले बच्चो के घर पर जाकर अधिकारियों को सुनवाई करते हुए सारी राहत प्रदान करनी चाहिए। क्योंकि अगर इन बच्चों को टीबी की निःशुल्क दवा नहीं मिली, तो इन बच्चों को भी टीबी नामक बीमारी मौत के मुंह तक ले जा सकती है। सरकार ने चाहे जितने भी कार्यक्रम चला रखे हैं, लेकिन अगर दस्तावेजों के अभाव में कोई दर-दर भटकने को मजबूर हो जाये और दवा तक नहीं मिले, इससे ज्यादा विडम्बना की कोई बात नहीं सकती। भंवरी देवी ने बताया कि मुकेश व माया की माता चैनकी, पिता हड़मानाराम, बच्चों के भाई विनोद कुमार की टीबी से मौत हो चुकी है। ऐसे में इन बच्चों को जब खांसी आती है, तो काफी डर लगता है। गांव के लोग भी मदद करते हैं। लेकिन सरकार की पालनहार जैसी योजनाओं की जरूरत इस प्रकार के बच्चों को होती है। दुख की बात ये है कि इतने सारे विभाग सरकार के जन कल्याण के लिए बने हुए हैं, लेकिन एक विभाग भी घर आकर इन बच्चों की मदद नहीं कर पाया।