बेटी के जन्म पर भव्य उत्सव, बेटे जैसी खुशियां, बेटी के जन्म पर कुआं पूजन से दशोठण तक

संजय सोनी
झुंझुनू (नवयत्न) । नवरात्र में हम नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा करते हैं। कन्याओं को देवी मानकर उनके पैर पूजते हैं, उन्हें भोजन कराते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या कन्या का सम्मान सिर्फ इन नौ दिनों तक ही सीमित रहना चाहिए? राजस्थान के झुंझुनूं ने इस सवाल का जवाब एक ऐसी मिसाल पेश करके दिया है। जो समाज की सोच बदलने की ताकत रखती है। यहां एक छोटी-सी ढाणी में बेटी के जन्म पर वो खुशियां मनाई गईं, जो कभी सिर्फ बेटे के जन्म तक सीमित हुआ करती थीं। न कुआं पूजन में कोई कमी, न दशोठण की रस्मों में कोई भेदभाव। ढोल-नगाड़े बजे, महिलाएं झूमीं और पूरा परिवार बेटी के जन्मोत्सव में सराबोर नजर आया। नवलगढ़ उपखंड की ग्राम पंचायत नवलड़ी की ढाणी धर्माणा से आई ये तस्वीर सिर्फ एक परिवार की खुशी नहीं, बल्कि बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान और महिला सशक्तिकरण की एक जीवंत मिसाल है। झुंझुनूं ने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। इसकी असली तस्वीर अब जिले की छोटी-छोटी ढाणियों में भी नजर आने लगी है। ऐसी ही एक मिसाल देखने को मिली नवलगढ़ उपखंड की नवलड़ी पंचायत स्थित ढाणी धर्माणा में। शिक्षाविद् और जाने-माने मोटिवेशन गुरु बीएल रणवां—सुमन रणवां के परिवार में पोती आयरा का जन्म हुआ, तो परिवार में खुशियां अनलिमिटेड थी। पहले बेटे के जन्म पर कुआं पूजन होता था, पीहर पक्ष से छूछक आता था और दशोठण जैसे पारंपरिक आयोजन होते थे। लेकिन बेटी के जन्म पर ऐसी खुशियां मनाने की परंपरा देखने को नहीं मिलती थी। ढाणी धर्माणा में इस पुरानी सोच को पीछे छोड़ते हुए आयरा के जन्म पर कुआं पूजन से लेकर दशोठण तक की सभी रस्में उसी उल्लास के साथ निभाई गईं, जो कभी केवल बेटों के जन्म पर देखने को मिलता था। पंजाब से ढोल बजाने वाले बुलाए गए। बैंड-बाजे और डीजे की धुन पर महिलाओं ने जमकर नृत्य किया। सैंकड़ों ग्रामीण महिलाएं इस उत्सव की गवाह बनीं। उनके लिए यह सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि बदलते समाज की नई तस्वीर थी।
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81 साल के दादा और 79 साल की दादी भी खुद को रोक नहीं पाई
81 वर्षीय बड़े दादा सुलतान सिंह रणवां और 79 वर्षीय बड़ी दादी हरकौरी देवी भी अपनी खुशी रोक नहीं पाए। आयरा की मां आशा और पिता राहुल रणवां ने भी परिवार के साथ खुशियां मनाईं। इस आयोजन में राजस्थान सरकार के यूडीएच मंत्री झाबरसिंह खर्रा और भाजपा जिलाध्यक्ष हर्षिनी कुलहरि भी पहुंचे। उन्होंने इस पहल को समाज में सकारात्मक बदलाव का संदेश देने वाला कदम बताया। एक छोटी-सी ढाणी में उठाया गया यह कदम बता रहा है कि बदलाव की शुरुआत बड़े मंचों से ही नहीं, अपने घर से भी की जा सकती है। इस मौके पर बीएल रणवां ने कहा कि “मैं समाज को यह संदेश देना चाहता हूं कि बेटियों के जन्म पर खुशियां मनाएं और उन्हें आगे लेकर आएं। बेटियों की अच्छी परवरिश करें, अच्छे संस्कार दें, बेहतर शिक्षा दें और उनके लिए ऐसा वातावरण बनाएं कि वे खुलकर आगे बढ़ सकें। बेटियों के रास्ते में रुकावटें खड़ी मत कीजिए। उन्हें आकाश में उड़ने दीजिए। आज का समय बेटियों का है और विकसित भारत के निर्माण में उनकी बहुत बड़ी भूमिका होगी।” एडीईओ उम्मेद सिंह महला ने कहा कि “रणवां जी ने महिला सशक्तिकरण की शुरुआत अपने घर से की है। यह जिले में एक बड़ी इबारत लिखेगी और बहुत से लोग इनका अनुकरण करेंगे। मैं उनकी इस पहल के लिए धन्यवाद देता हूं। आयरा को शुभकामनाएं और कामना है कि बेटियां खुले आसमान में उड़कर जिले और देश का नाम रोशन करें।”
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यूडीएच मंत्री ने कहा—रणवां परिवार ने समाज को दी नई दिशा
ढाणी धर्माणा में बेटी के जन्म पर हुए इस आयोजन ने यह भी साबित किया कि जब परिवार अपनी सोच बदलता है, तो उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। कार्यक्रम में पहुंचे यूडीएच मंत्री झाबरसिंह खर्रा ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों में बेटियों के प्रति समाज की सोच में सकारात्मक बदलाव आया है। प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर शिक्षा और खेलकूद तक बेटियां अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। मेरिट में बेहतर प्रदर्शन और हर क्षेत्र में आगे बढ़ती बेटियों ने समाज को यह सोचने पर मजबूर किया है कि बेटा और बेटी के बीच अंतर करने का कोई औचित्य नहीं है। मंत्री ने इस तरह की पहल को बदलते सामाजिक नजरिए का संकेत बताया। ढाणी धर्माणा में बेटी के जन्म पर निभाई गई परंपराएं केवल एक परिवार की खुशियों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने उन रूढ़ियों पर सवाल खड़े किए, जिनके कारण बेटियों को कभी बेटे जैसी खुशियां नहीं मिल पाती थीं। दरअसल, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का उद्देश्य केवल बेटियों को जन्म लेने का अवसर देना ही नहीं, बल्कि उन्हें शिक्षा, सुरक्षा, सम्मान और समान अवसर उपलब्ध कराना भी है। इसकी शुरुआत तभी होगी, जब बेटी के जन्म को भी बेटे की तरह परिवार का सबसे बड़ा उत्सव माना जाएगा।

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