अक्षर का समर्पण
अक्षर अकेले होते हैं—
चुपचाप, बिखरे हुए,
अपने ही भीतर सिमटे,
जैसे कोई अनकही बात
मन की गहराइयों में ठहर जाती हो।
वे रहते तो हैं अमर,
पर अलग-अलग ऐसे लगते हैं
मानो धड़कन तो है
पर उसमें स्पंदन नहीं,
जीवन तो है
पर उसमें स्वर नहीं।
वे प्रतीक्षा करते हैं—
किसी मिलन की,
किसी संगति की,
जहाँ वे अपने छोटे अस्तित्व से
कुछ बड़ा बन सकें।
फिर एक क्षण आता है—
धीरे-धीरे,
संकोच से भरा हुआ,
जब वे एक-दूसरे के पास आते हैं,
अपने भीतर जगह बनाते हैं,
और ‘मैं’ को थोड़ा-थोड़ा छोड़ते हैं।
तभी कुछ अद्भुत घटित होता है—
वे शब्द बन जाते हैं,
और शब्द बनते ही
मौन भी बोलने लगता है,
भावों को दिशा मिलती है,
और जीवन को अर्थ।
यह मिलन केवल जोड़ नहीं,
यह समर्पण है—
जहाँ हर अक्षर
अपने ‘अहं’ का अंश त्यागता है,
तभी कोई बड़ा सत्य जन्म लेता है।
अक्षर ‘जड़’ होते हैं—
पर शब्द बनते ही
‘चेतना’ में बदल जाते हैं,
जैसे कोई दीप
अचानक प्रज्वलित हो उठे।
कहा गया है—
ब्रह्म भी शब्द है,
और शब्द की जड़ में
अक्षर का मौन’तप’ छिपा है।
और यहीं से
कविता जीवन से जुड़ती है—
हम भी तो अक्षर ही हैं,
अलग-अलग,
अधूरे,
अपने-अपने ‘अहं’ में बंद।
एक व्यक्ति एक अक्षर है,
परिवार एक शब्द,
समाज एक वाक्य,
और राष्ट्र एक महाकाव्य।
जब हम अलग रहते हैं,
तो केवल ‘मैं’ रह जाते हैं,
पर जब हम जुड़ते हैं—
स्नेह, विश्वास और समर्पण से—
तभी ‘हम’ जन्म लेता है।
और वही ‘हम’
जीवन को अर्थ देता है,
समाज को शक्ति देता है,
और राष्ट्र को गरिमा।
अकेले हम संभावना हैं,
मिलकर हम सृजन हैं,
अकेले हम अधूरे हैं,
मिलकर हम पूर्ण हैं।
तुम भी एक अक्षर हो अभी—
जब ‘मैं’ से निकल ‘हम’ में मिलोगे,
तब एक महान शब्द बनोगे—
जो युगों-युगों तक गूंजता रहेगा।
लेखक: डॉ.ओम प्रकाश भार्गव
प्रांत अध्यक्ष, अखिल भारतीय साहित्य परिषद,जयपुर प्रांत