राम ने इंद्र से रथ नहीं, केवट से नाव मांगी और उसे महत्व दिया – पं. सुरोलिया
निसं
मुकुंदगढ़ (नवयत्न)। भगवान श्रीराम ने समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को भी महत्व दिया और उसे मुख्यधारा से जोड़ने का संदेश दिया। उन्होंने इंद्र से रथ नहीं मांगा, बल्कि गंगा पार जाने के लिए केवट से नाव मांगी और उसे विशेष महत्व दिया। यह बात ज्योतिषाचार्य पं. आदित्य नारायण सुरोलिया ने मुकुंदगढ़ के श्रीराम मंदिर दुर्गा पूजा स्थल और ठंडे वाले बालाजी दुर्गा पूजा स्थल पर अलग-अलग दिन आयोजित ‘सबके रामÓ आख्यान माला में कही। पं. सुरोलिया ने कहा कि भगवान श्रीराम समग्र समाज की आत्मा हैं। उनके आदर्श समरसता, करुणा और समानता की सीख देते हैं। वे वंचित, उपेक्षित, असहाय और जरूरतमंद लोगों को भी सम्मान देते हैं। उनके जीवन के प्रसंग बताते हैं कि समाज में किसी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। इस अवसर पर समिति पदाधिकारियों पं. विजय शर्मा, मनीष योगी, प्रवीण सोनी, सुभाष शर्मा, नरेंद्र योगी, बन्ने सिंह पारीक और महावीर पीपलवा ने पं. सुरोलिया का स्वागत किया। आख्यान माला में अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।
धर्म और सत्य के बल पर मिली विजय
उन्होंने कहा कि रावण स्वर्ण रथ पर सवार था, जबकि भगवान श्रीराम ने नंगे पैर और बिना रथ के युद्ध किया। इसके बावजूद श्रीराम की विजय हुई। यह प्रसंग बताता है कि सफलता केवल बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि धर्म, सत्य और सदाचार के बल पर मिलती है। पं. सुरोलिया ने जटायु के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि जटायु ने माता सीता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की परवाह किए बिना रावण से युद्ध किया। घायल जटायु को भगवान श्रीराम ने पिता तुल्य सम्मान दिया और उनका अंतिम संस्कार किया। उन्हें निज धाम प्रदान कर श्रीराम ने त्याग, समर्पण और अच्छे चरित्र का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम सबके हैं और किसी के साथ भेदभाव नहीं करते।