भगवान श्री कृष्ण की भक्ति निष्काम भाव से ही करें महाराज
महेन्द्र खडोलिया
श्रीमाधोपुर (नवयत्न) । निष्काम भाव से की गई भक्ति भगवान को भक्त के अधीन कर देती है। कलयुग में परम भक्त नरसी मेहता की कथा के माध्यम से व्यासपीठाचार्य प्रयागदास जी महाराज ने “भक्त के वश में है भगवान “की कलियुग में सार्थकता को स्पष्ट किया। पुरुषोत्तम मास के अंतर्गत चल रही मंदिर श्री गोपीनाथ श्रीमाधोपुर में श्रीमद् भागवत कथा में महाराज श्री ने पुरुषोत्तम मास के 25वीं दिवस भगवान श्री कृष्ण की धर्ममय राजनीति लीला के अंतर्गत अक्रूर धृतराष्ट्र संवाद, पांडवों को हस्तिनापुर राज्य में समान भाग देने का निवेदन, जरासंध से युद्ध, द्वारिका नगरी का निर्माण, मांधाता पुत्र मुचकन्द के द्वारा कालयवन को भस्म करना, महाराज मुचकन्द का कलयुग में भक्त शिरोमणि नरसी मेहता के रूप में आना, रुक्मणी जी का भगवान श्री कृष्ण को संदेश ,भगवान श्री कृष्ण का कुण्डिनपुर गमन, रुक्मणी हरण की दिव्य लीला का वर्णन किया।
रात्रि में राम चरित्र मानस के हृदय स्थल सुंदरकांड के अंतर्गत भक्तों द्वारा सामूहिक रूप से भक्तशिरोमणि हनुमान जी की शक्ति आह्वान ,समुद्र पार कर हनुमान जी का लंका में प्रवेश, माता सीता को भगवान राम का संदेश एवं भगवान राम के द्वारा समुद्र पर रामसेतु के निर्माण की पौरूषमय कथा का सामूहिक संगीतमय गान किया गया ।महंत मनोहर शरण दास जी ने बताया प्रातःकाल भगवान श्री राधागोपीनाथ का द्वारिकाधीश के रूप में राजशाही पोशाक से भगवान का राजशाही श्रृंगार किया गया। पुरुषोत्तम मास कथा के अंतर्गत पुरुषोत्तम मास में भगवान श्री कृष्ण की प्रदक्षिणा का दिव्य एवं पुण्यमय प्रभाव का विस्तृत वर्णन किया गया।