सारथी को भगवान तक पहुंचना मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य- पंडित तिवाड़ी
बृजेन्द्र सिंह लमोरिया
चिड़ावा (नवयत्न) । जरा जीव विचारों मन में तेरी आत्मा का कैसा रूप है ये देह नहीं है तेरी आत्मा तू तो सद्चित आनन्द रूप है। इस भजन के माध्यम से वाणी भूषण प्रभुशरण तिवाड़ी ने स्पष्ट किया कि जो शरीर हम देख रहें है वह हमारा नहीं है। उन्होंने कहा कि दृष्टा एवं दृश्य कभी एक नहीं हो सकते। यह शरीर हमारा नहीं है मैं स्वयं आत्मा हूं। आत्मा ईश्वर का अंश है, जैसे बूँद समुद्र का अंश है। सेहीकलां के नेत दादा मंदिर परिसर में पवित्र पुरुषोत्तम मास के अवसर पर चल रही श्रीमद् भागवत कथा के अंतिम दिवस तिवाड़ी ने कहा कि मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य भगवान की प्राप्ति है। यह शरीर रथ है आत्मा इसकी सारथी है। रथ द्वारा सारथी को भगवान तक पहुंचना है। कथा में श्रीकृष्ण- सुदामा की सजीव झांकी एवं मधुर भजनों से सम्पूर्ण वातावरण भक्तिमय हो गया। कथा के प्रारंभ में यजमान दीनदयाल शर्मा व अशोक शर्मा ने सपत्निक भागवत व व्यास पूजन किया। कथा की समाप्ति पर आयोजन समिति के सदस्यों ने कथा व्यास वाणीभूषण प्रभुशरण तिवाड़ी का अभिनंदन किया। कथा के पश्चात मुख्य यजमान दीनदयाल शर्मा द्वारा हवन एवं प्रसाद का आयोजन किया गया। इस दौरान डॉ जगदीश प्रसाद शर्मा, विक्रम शर्मा, करन सिंह शेखावत, सत्यनारायण कुमावत, हजारीलाल शर्मा, बुद्धिधर कुलहरी, भागीरथ जांगिड, राकेश पूनिया प्रवीण शर्मा, राजेंद्र सिंह शेखावत, मातुराम महरिया, संजय भगत, नत्थुराम शर्मा, जितेंद्र जांगिड़, ब्रह्मानंद पूनिया, संतोष सिंह शेखावत, रतनलाल शर्मा, पवन शर्मा, योगेश जांगिड, निशांत जांगिड,अरविन्द शर्मा, संजय भगत, सीताराम शर्मा, अशोक शर्मा, संतोष सिंह शेखावत, ओमप्रकाश महरिया, प्रमोद भगत, होशियारी लाल शर्मा, गजाननंद शर्मा, अनिल शर्मा, धरमसिंह शेखावत, रवि कुमावत, कैलाश वर्मा, राजेंद्र नायक सहित काफी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।