महानिरीक्षक के आदेश के बाद किसका संरक्षण . . .?
सुरेन्द्र शर्मा
झुंझुनू (नवयत्न)। राजस्थान सरकार के पंजीयन एवं मुद्रांक विभाग के महानिरीक्षक, अजमेर द्वारा 10 जुलाई 2026 को जारी किए गए स्पष्ट और सख्त आदेशों के बावजूद झुंझुनू में प्रशासनिक उदासीनता और बाबू राज की हकीकत खुलकर सामने आ गई है। 95 कार्मिकों के तबादले तत्काल प्रभाव से किए जाने के निर्देश दिए गए थे, जिनका उद्देश्य विभागीय कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और गति लाना था। लेकिन 25 दिन बीत जाने के बाद भी आदेशों की खुलेआम अनदेखी न सिर्फ प्रशासनिक अनुशासन पर सवाल खड़े कर रही है, बल्कि यह भी संकेत दे रही है कि जमीनी स्तर पर आदेशों से ज्यादा प्रभाव किसका चलता है। यह मामला अब सिर्फ एक तबादले तक सीमित नहीं रहकर पूरे सिस्टम की कार्यशैली और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न बन गया है। आदेश में स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि संबंधित कार्मिकों को तुरंत कार्यमुक्त कर नई जगह पर भेजा जाए।
तत्काल की परिभाषा पर सवाल
प्रशासनिक शब्दावली में तत्काल प्रभाव का अर्थ होता है-बिना देरी के 1 से 3 दिन के भीतर आदेश की पालना। लेकिन यहां 25 दिन बाद भी आदेश ठंडे बस्ते में हैं।
जमीनी हकीकत : आदेश बेअसर
स्थानांतरण सूची में क्रमांक 38 पर शामिल कार्मिक त्रिलोक सिंह अब तक न तो झुंझुनू से रिलीव हुए हैं और न ही कोटपूतली में जाकर ज्वाइन किया है।
डीएलसी से बदला बहाना टेक्निकल इशू
सबसे बड़ा सवाल उप पंजीयन कार्यालय के बयानों पर खड़ा हो रहा है। पहले कहा गया कि डीएलसी का कार्य चल रहा है इसलिए कार्मिक को रिलीव नहीं किया गया। लेकिन जब मीडिया ने सवाल उठाया तो खुद यह स्वीकार किया गया कि डीएलसी का कार्य पूर्ण हो चुका है और उसका प्रकाशन भी हो चुका है। इसके बाद भी कार्मिक को रिलीव नहीं किया गया।
अब नया तर्क सामने आया-टेक्निकल इशू
सवाल: क्या तकनीकी समस्या सिर्फ पुराने कार्मिक ही सुलझाएंगे ?
अगर डीएलसी का कार्य पूरा हो चुका है तो फिर टेक्निकल इशू का बहाना कितना जायज है ?
क्या नई जगह पर आने वाले कार्मिक इन तथाकथित तकनीकी समस्याओं को नहीं समझ सकते ?
या फिर यह सिर्फ आदेशों की अनदेखी को ढकने का तरीका है ?
सरकारी आवास पर भी कब्जा
संबंधित कार्मिक द्वारा झुंझुनूं में मिला सरकारी आवास भी अब तक खाली नहीं किया गया है, जो नियमों की खुली अनदेखी है। सूत्रों के अनुसार वापस झुंझुनू आने तक किसी अन्य को किराये पर देने का इरादा है।
चर्चा में झुंझुनू की पुरानी छवि
झुंझुनू को लेकर पहले भी यह चर्चा रही है कि यहां पदस्थापित कार्मिक स्थानांतरण के बाद भी लंबे समय तक जमे रहते हैं या फिर दोबारा वापस आ जाते हैं। यह मामला उसी प्रवृत्ति को फिर उजागर करता है।
इन्होंने क्या खूब कहा
ट्रांसफर हुआ है, अभी झुंझुनूं ही हूं, जहां तबादला किया है वहां अभी ज्वाइन नहीं किया है, घुमाफिरा कर कहा करेंगे। त्रिलोक सिंह, कार्मिक
डीएलसी का कार्य चल रहा था . . . प्रकाशन हो चुका है लेकिन टेक्निकल इशू है। रिलीव नहीं किया। कुलदीप सिंह, उप पंजीयक, झुंझुनू।
उठते सवाल : आदेश से ऊपर कौन ?
लगातार बदलते बयान और देरी कई सवाल खड़े कर रहे हैं।
क्या महानिरीक्षक के आदेशों का कोई महत्व नहीं रह गया ?
क्या बाबू राज के आगे आदेश बेअसर हो चुके हैं ?
या फिर किसी के संरक्षण में नियमों को दरकिनार किया जा रहा है ?
अब कार्रवाई पर नजर
जब आदेश तत्काल प्रभावसे लागू करने के हो और डीएलसी का कार्य भी पूरा हो चुका हो तब भी 25 दिन तक रिलीव नहीं करना सीधे-सीधे लापरवाही या जानबूझकर टालने की ओर इशारा करता है। अब देखना यह होगा कि जिम्मेदारी तय होती है या मामला फिर फाइलों में दबा दिया जाएगा।