निकाय चुनाव का रण तैयार, कांग्रेस गायब, भाजपा और विकास मंच आमने-सामने

श्रीराम तिवाड़ी
नोखा (नवयत्न)। नगरपालिका चुनाव की रणभेरी बजने से पहले ही नोखा की राजनीति में घमासान शुरू हो गया है। इस बार सबसे बड़ा सियासी सवाल पालिकाध्यक्ष की कुर्सी को लेकर है। अध्यक्ष पद ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित होने की स्थिति में राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। भाजपा में जहां ओबीसी चेहरों ने अपनी दावेदारी को लेकर सक्रियता बढ़ा दी है, वहीं स्थानीय विकास मंच ने भी वार्डवार चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। लेकिन इस पूरे चुनावी माहौल में सबसे ज्यादा चर्चा अगर किसी की है तो वह है कांग्रेस की खामोशी। जहां भाजपा और विकास मंच में बैठकों, संपर्कों और टिकट की दावेदारी को लेकर हलचल तेज हो चुकी है, वहीं कांग्रेस कार्यालय में फिलहाल चुनावी गतिविधियां नजर नहीं आ रही हैं। ऐसे में नोखा निकाय चुनाव का मुख्य मुकाबला फिलहाल भाजपा बनाम विकास मंच की ओर जाता दिखाई दे रहा है।
कांग्रेस की खामोशी ने खड़े किए सवाल
नोखा विधानसभा क्षेत्र की वर्तमान विधायक सुशीला रामेश्वर डूडी कांग्रेस से हैं, लेकिन नगरपालिका चुनाव को लेकर कांग्रेस संगठन की सक्रियता फिलहाल दिखाई नहीं दे रही। कांग्रेस कार्यालय में न तो संभावित प्रत्याशियों की भीड़ नजर आ रही है और न ही वार्डवार चुनावी बैठकों की कोई बड़ी हलचल सामने आई है। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार कांग्रेस के नोखा निकाय चुनाव में उम्मीदवार नहीं उतारने को लेकर भी चर्चाएं चल रही हैं। हालांकि पार्टी की ओर से इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। यदि कांग्रेस चुनाव मैदान से दूरी बनाती है तो यह नोखा की स्थानीय राजनीति के लिए बड़ा घटनाक्रम होगा। खासकर इसलिए क्योंकि कांग्रेस लंबे समय से नोखा की राजनीति का प्रमुख हिस्सा रही है। पिछले कुछ निकाय चुनावों में पार्टी की कमजोर मौजूदगी के बाद इस बार कांग्रेस की कथित निष्क्रियता ने स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दे दी है।
भाजपा में अध्यक्ष पद के लिए मची होड़
ओबीसी वर्ग से पालिकाध्यक्ष बनने की संभावना ने भाजपा के भीतर सियासी हलचल बढ़ा दी है। कई ओबीसी चेहरे सक्रिय हो गए हैं और अध्यक्ष पद की दौड़ में अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं। वार्डों में जनसंपर्क से लेकर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं तक संपर्क साधने का दौर शुरू हो चुका है। भाजपा के संभावित दावेदार अपने राजनीतिक प्रभाव, सामाजिक समीकरण और वार्ड स्तर पर पकड़ के आधार पर खुद को मजबूत साबित करने में लगे हैं। यानी टिकट की लड़ाई सिर्फ वार्ड पार्षद बनने तक सीमित नहीं है, बल्कि कई चेहरों की नजर सीधे पालिकाध्यक्ष की कुर्सी पर है।
विकास मंच ने भी खोल दिया मोर्चा
भाजपा के सामने स्थानीय विकास मंच ने भी मजबूती से मोर्चा खोल दिया है। पूर्व संसदीय सचिव कन्हैया लाल झंवर और निवर्तमान पालिकाध्यक्ष नारायण झंवर लगातार वार्डों में सक्रिय हैं। विकास मंच द्वारा वार्डवार बैठकें आयोजित की जा रही हैं और संभावित प्रत्याशियों के नामों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। कई वार्डों में प्रत्याशियों की घोषणा भी शुरू हो चुकी है। विकास मंच की लगातार बढ़ती सक्रियता ने भाजपा की चुनावी रणनीति को भी चुनौती दे दी है। अब दोनों खेमों की नजर एक-दूसरे के मजबूत वार्डों और प्रभावशाली चेहरों पर है।
नारायण-संतोष बनाम निर्मल-जयश्री की जोड़ी चर्चा में
इस चुनाव में दो पति-पत्नी की जोडिय़ां भी राजनीतिक आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। विकास मंच से नारायण झंवर और संतोष झंवर, जबकि भाजपा से निर्मल भूरा और जयश्री भूरा अलग-अलग वार्डों से चुनाव लडऩे की तैयारी में बताए जा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि दोनों जोडिय़ों के पति-पत्नी अलग-अलग वार्डों से चुनाव लड़ेंगे, इसलिए उनका सीधा मुकाबला एक-दूसरे से नहीं होगा। मगर दोनों परिवारों की राजनीतिक प्रतिष्ठा और प्रभाव जरूर चुनावी मैदान में परखा जाएगा। इन जोडिय़ों को लेकर शहर के राजनीतिक गलियारों में अभी से चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।
आरएलपी और निर्दलीय बिगाड़ेंगे गणित
चुनावी मैदान में आरएलपी और कई निर्दलीय प्रत्याशियों की मौजूदगी भी मुकाबले को आसान नहीं रहने देगी। खासकर उन वार्डों में जहां भाजपा और विकास मंच के बीच कांटे की टक्कर होगी, वहां मजबूत निर्दलीय प्रत्याशी या आरएलपी उम्मीदवार वोटों का गणित पूरी तरह बदल सकते हैं। नोखा की राजनीति में व्यक्तिगत संपर्क, परिवार और सामाजिक समीकरणों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में कई वार्डों में पार्टी के बजाय चेहरा भारी पड़ सकता है।
प्रवासी नोखावासी बनेंगे गेम चेंजर ?
नोखा के हजारों परिवार देश के अलग-अलग हिस्सों में कारोबार और रोजगार से जुड़े हुए हैं। असम, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली सहित देश के अनेक राज्यों और महानगरों में नोखावासियों की बड़ी संख्या रहती है। निकाय चुनाव में इन प्रवासी मतदाताओं की भूमिका अहम मानी जा रही है। चुनाव के समय बड़ी संख्या में प्रवासी मतदाताओं के नोखा पहुंचने की स्थिति में कई वार्डों का चुनावी परिणाम प्रभावित हो सकता है। यही कारण है कि संभावित प्रत्याशियों ने स्थानीय मतदाताओं के साथ प्रवासी परिवारों से संपर्क साधने की रणनीति भी शुरू कर दी है।
अबकी बार मुकाबला कितना रोचक ?
नोखा नगरपालिका चुनाव की मौजूदा तस्वीर को देखें तो तीन बातें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण नजर आ रही हैं। पहली-ओबीसी अध्यक्ष पद की संभावित आरक्षण व्यवस्था। दूसरी-भाजपा और विकास मंच की तेज होती चुनावी सक्रियता। तीसरी-कांग्रेस की फिलहाल दिखाई दे रही राजनीतिक खामोशी। अगर कांग्रेस मैदान में नहीं उतरती है तो नोखा में निकाय चुनाव का राजनीतिक केंद्र पूरी तरह भाजपा और विकास मंच के बीच सिमट सकता है। वहीं आरएलपी और निर्दलीय प्रत्याशी कई वार्डों में इस मुकाबले को त्रिकोणीय या बहुकोणीय बना सकते हैं। अब असली तस्वीर आरक्षण की आधिकारिक घोषणा, टिकट वितरण और नामांकन के बाद सामने आएगी। लेकिन इतना तय है कि नोखा में पालिका की कुर्सी के लिए सियासी बिसात बिछ चुकी है। कांग्रेस की खामोशी के बीच भाजपा और विकास मंच आमने-सामने हैं। ओबीसी अध्यक्ष पद की दौड़ ने मुकाबले को और गरमा दिया है। अब देखना यह होगा कि चुनावी रण में किसका संगठन भारी पड़ता है और किसका चेहरा मतदाताओं का भरोसा जीतता है।

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