टिकाऊ कार्यकर्ता से बिकाऊ पार्षद तक? भाजपा-कांग्रेस में शुरू हुई बाड़ाबंदी

टिकट देते समय जताया था भरोसा, परिणाम से पहले अपनों पर ही अविश्वास

 

सुरेंद्र शर्मा 

झुंझुनूं (नवयत्न)। निकाय चुनाव में टिकट वितरण के दौरान भाजपा और कांग्रेस दोनों प्रमुख दलों ने दावा किया था कि पार्टी के मजबूत, सक्रिय और टिकाऊ कार्यकर्ताओं को ही प्रत्याशी बनाया गया है। लेकिन चुनाव संपन्न होते ही नगर परिषद में बोर्ड बनाने की कवायद शुरू होने से पहले जिस तरह दोनों दलों के नेताओं ने अपने संभावित विजयी पार्षदों की बाड़ाबंदी शुरू कर दी, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि जिन कार्यकर्ताओं को पार्टी ने भरोसेमंद मानकर टिकट दिया, पार्षद बनते ही उन्हीं पर अविश्वास क्यों?

क्या पार्टी को आशंका है कि उसके अपने कार्यकर्ता पार्षद बनते ही दूसरे खेमे का दामन थाम सकते हैं? क्या राजनीतिक लालच के आगे पार्टी निष्ठा कमजोर पड़ सकती है? या फिर दोनों प्रमुख दलों को क्रॉस वोटिंग का डर सता रहा है?

 

भाजपा ने संभाली कमान, संभावित विजेताओं की बाड़ाबंदी

 

गुरुवार को भाजपा विधायक राजेंद्र भाम्बू ने कमान संभाली। बताया जा रहा है कि उन्होंने भाजपा के संभावित विजयी पार्षदों एवं उनके प्रतिनिधियों को बसों एवं निजी गाड़ियों के जरिए अज्ञात स्थान के लिए रवाना किया। चुनाव परिणाम आने से पहले ही संभावित पार्षदों को अपने नियंत्रण में रखने की भाजपा की यह कवायद राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गई।

 

कांग्रेस भी पीछे नहीं, ओला ने संभाला मोर्चा

 

शुक्रवार को इसी तर्ज पर कांग्रेस के वर्तमान सांसद बृजेंद्र सिंह ओला ने मोर्चा संभाला। कांग्रेस के संभावित विजयी पार्षदों के साथ-साथ निर्दलीय प्रत्याशियों के जीतकर आने की स्थिति में उनके साथ भी राजनीतिक समन्वय की कवायद दिखाई दी। कांग्रेस की ओर से भी संभावित पार्षदों को बसों के जरिए अपने विश्वसनीय स्थान पर ले जाकर बाड़ाबंदी किए जाने की चर्चा रही।

इससे संकेत साफ है कि दोनों प्रमुख दल परिणाम आने से पहले ही बोर्ड बनाने के लिए संख्या जुटाने और अपने संभावित पार्षदों को ‘सुरक्षित’ रखने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

 

क्रॉस वोटिंग का डर, झुंझुनूं में नया नहीं खेल

 

झुंझुनूं की राजनीति में क्रॉस वोटिंग कोई नया खेल नहीं है। पिछले नगर परिषद चुनाव और जिला प्रमुख के चुनाव में भी क्रॉस वोटिंग के आरोप और राजनीतिक समीकरण चर्चा में रहे हैं। यही वजह है कि इस बार भाजपा और कांग्रेस दोनों ही अपने-अपने संभावित पार्षदों को संभालने में जुटे हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा, कांग्रेस और निर्दलीय खेमे से कुछ ऐसे पार्षद चुनकर आ सकते हैं, जो बोर्ड गठन के समय पार्टी लाइन से अलग जाकर अपने पसंदीदा चेहरे के पक्ष में मतदान करें। ऐसी स्थिति में पार्टी छोड़ने से लेकर क्रॉस वोटिंग तक की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

 

60 वार्ड, लेकिन दोनों दलों की स्थिति ने बढ़ाई बेचैनी

 

नगर परिषद झुंझुनूं के 60 वार्डों में भाजपा केवल 41 वार्डों में ही अपने प्रत्याशी उतार सकी, जबकि कांग्रेस भी 9 वार्डों में प्रत्याशी नहीं उतार पाई। चुनाव प्रचार के दौरान टिकट वितरण को लेकर दोनों दलों में असंतोष और बगावत के स्वर भी सामने आए।

राजनीतिक पंडितों के एक वर्ग का आकलन है कि इस बार जनता ने टिकट वितरण से नाराजगी जताते हुए भाजपा को अपेक्षित समर्थन नहीं दिया और कम मतदान भी इसी असंतोष का संकेत हो सकता है। हालांकि वास्तविक तस्वीर 14 सितंबर को मतगणना के बाद ही सामने आएगी।

 

सट्टा बाजार और आम चर्चा में कांग्रेस आगे!

 

परिणाम से पहले आमजन की चर्चाओं और सटोरियों के अनुमान में भाजपा को करीब 17, कांग्रेस को 29 सीटें मिलने का दावा किया जा रहा है। शेष वार्डों में निर्दलीयों का दबदबा रहने की संभावना जताई जा रही है। यदि यह अनुमान परिणाम में बदलता है तो झुंझुनूं नगर परिषद का बोर्ड किसी एक दल के बजाय निर्दलीयों के समर्थन या नेतृत्व पर निर्भर हो सकता है।

ऐसे समीकरण में एक-एक पार्षद की कीमत बढ़ेगी और बोर्ड गठन का पूरा खेल संख्या से ज्यादा ‘निष्ठा’ और ‘क्रॉस वोटिंग’ पर टिक सकता है।

 

भाजपा बोर्ड नहीं बना पाई तो भाम्बू के लिए बड़ा सवाल

 

यदि भाजपा बहुमत के आसपास पहुंचने के बावजूद नगर परिषद में अपना बोर्ड बनाने में सफल नहीं होती है तो इसका सीधा राजनीतिक असर विधायक राजेंद्र भाम्बू की साख पर पड़ना तय माना जाएगा। खासकर तब, जब चुनाव से पहले टिकट वितरण और संगठन की रणनीति में विधायक की भूमिका प्रमुख रही हो।

अब असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि 14 सितंबर को कौन पार्षद बनेगा, बल्कि सवाल यह भी है कि चुनाव जीतने के बाद कौन किसके साथ खड़ा रहेगा?

टिकट देते समय जिन्हें पार्टी ने ‘टिकाऊ’ माना था, परिणाम आने से पहले उन्हीं की बाड़ाबंदी यह सवाल जरूर खड़ा कर रही है कि कहीं राजनीति में टिकाऊ कार्यकर्ता की परिभाषा अब ‘बिकाऊ न हो जाए’ के डर तक तो सीमित नहीं रह गई?

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