दामाद को टिकट, परिवारवाद पर घिरे भाम्बू
अशोक राईका
झुंझुनूं (नवयत्न)। नगर परिषद चुनाव में भाजपा के टिकट वितरण ने विधायक राजेंद्र भाम्बू के सामने नई सियासी चुनौती खड़ी कर दी है। वार्ड 49 से उनके दामाद मनु धनकड़ को टिकट मिलने के बाद परिवारवाद का मुद्दा गरमा गया है। वहीं 60 में से 41 वार्डों में भाजपा प्रत्याशियों को जिताकर बोर्ड बनाने की चुनौती भी अब सीधे भाम्बू की राजनीतिक पकड़ से जोड़कर देखी जा रही है।
भाजपा ने 19 वार्डों में अधिकृत प्रत्याशी नहीं उतारे हैं। दूसरी ओर टिकट से वंचित दावेदारों की नाराजगी और निर्दलीय मैदान में उतरे प्रत्याशी कई वार्डों में पार्टी के समीकरण बिगाड़ सकते हैं। ऐसे में नगर परिषद चुनाव का परिणाम केवल बोर्ड का फैसला नहीं करेगा, बल्कि भाम्बू की टिकट रणनीति और स्थानीय संगठन पर पकड़ का भी राजनीतिक आकलन होगा।
वार्ड 49 पर सबसे ज्यादा नजर
विधायक के दामाद मनु धनकड़ को वार्ड 49 से टिकट मिलने के बाद यह सीट भाजपा के लिए सबसे चर्चित मुकाबलों में शामिल हो गई है। नाम वापसी के बाद यहां भाजपा प्रत्याशी मनु धनकड़ और निर्दलीय डॉ. कमलचंद सैनी आमने-सामने हैं।
डॉ. सैनी को भाजपा से टिकट नहीं मिलने के बाद उनका निर्दलीय मैदान में उतरना मुकाबले को रोचक बना रहा है। अब इस सीट पर परिणाम यह भी बताएगा कि पार्टी का अधिकृत टिकट भारी पड़ा या स्थानीय स्तर की नाराजगी और प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़।
उपचुनाव में परिवारवाद, अब खुद पर सवाल
विधानसभा उपचुनाव के दौरान भाजपा ने कांग्रेस पर परिवारवाद को लेकर निशाना साधा था। उसी चुनाव में राजेंद्र भाम्बू भाजपा के टिकट पर विधायक बने। अब उनके दामाद को पार्टी टिकट मिलने के बाद विरोधियों को भाजपा के उसी राजनीतिक नैरेटिव पर सवाल उठाने का मौका मिल गया है।
भाजपा इसे प्रत्याशी की योग्यता से जोड़ सकती है, लेकिन विपक्ष के लिए यह राजनीतिक प्रभाव और परिवारवाद का मुद्दा है। सवाल यह है कि परिवारवाद का राजनीतिक सिद्धांत केवल विरोधियों पर लागू होगा या अपने नेताओं के मामले में भी वही कसौटी अपनाई जाएगी?
भाम्बू के सामने असली चुनौती बोर्ड
भाम्बू के लिए सबसे बड़ी चुनौती दामाद की जीत से कहीं आगे है। उन्हें भाजपा को बहुमत तक पहुंचाकर नगर परिषद में बोर्ड बनाना होगा।
यदि भाजपा बोर्ड बनाने में सफल रहती है तो टिकट वितरण से लेकर चुनावी रणनीति तक उसका श्रेय भाम्बू के राजनीतिक खाते में जाएगा। इससे पार्टी के भीतर उनका कद भी बढ़ सकता है।
लेकिन यदि भाजपा बहुमत से दूर रहती है तो टिकट वितरण, बागियों को नहीं साध पाने और प्रत्याशी चयन को लेकर सवाल भी उन्हीं के सामने आएंगे।
उपचुनाव की जीत का निकाय में कितना असर?
विधानसभा उपचुनाव की बड़ी जीत के बाद अब नगर परिषद चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन पर सभी की नजर है। हालांकि निकाय चुनाव का गणित अलग है। यहां प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि, वार्ड स्तर के संबंध, स्थानीय मुद्दे और सामाजिक समीकरण कई बार पार्टी के बड़े नैरेटिव पर भारी पड़ जाते हैं।
यही कारण है कि 9 सितंबर का मतदान यह संकेत देगा कि उपचुनाव में भाजपा को मिला जनसमर्थन कितना स्थायी है और भाम्बू की अपनी राजनीतिक पकड़ कितनी मजबूत।
गुढ़ा फैक्टर भी चर्चा में
उपचुनाव के दौरान पूर्व विधायक राजेंद्र सिंह गुढ़ा की भूमिका और मौजूदगी भी राजनीतिक चर्चा का हिस्सा रही थी। अब निकाय चुनाव के परिणाम के बाद यह भी आकलन होगा कि भाजपा की उपचुनाव वाली सफलता में स्थानीय परिस्थितियों और अन्य प्रभावशाली राजनीतिक चेहरों की भूमिका कितनी थी।
जनता को इंतजार इन सवालों का
वार्ड 49 में दामाद की जीत, भाजपा का बोर्ड और पार्टी के बागियों का प्रदर्शन तीनों परिणाम भाम्बू की राजनीतिक स्थिति का अलग-अलग संदेश देंगे।
क्या दामाद को टिकट देना मास्टर स्ट्रोक साबित होगा?
क्या भाम्बू उपचुनाव की जीत को नगर परिषद में दोहरा पाएंगे?
क्या भाजपा बोर्ड बना पाएगी?
और अगर बोर्ड नहीं बना तो क्या टिकट वितरण की रणनीति पर सवालों की जिम्मेदारी भी विधायक भाम्बू के हिस्से आएगी?
इन सवालों का जवाब 9 सितंबर के मतदान और 14 सितंबर की मतगणना के बाद सामने आयेगा।