पीढिया बदली, फौज से रिश्ता नहीं टूटा
अशोक राईका
झुंझुनूं (नवयत्न)। झुंझुनूं की मिट्टी को सैनिकों की धरती यूं ही नहीं कहा जाता। यहां फौज केवल रोजगार का जरिया नहीं, बल्कि पीढिय़ों से चली आ रही गौरवशाली परंपरा है। जिले के बुहाना क्षेत्र के भिर्र गांव में ऐसे कई परिवार हैं, जिनकी तीन से चार पीढिय़ां सेना की वर्दी पहनकर देश की सेवा कर चुकी हैं। भिर्र गांव के रिटायर्ड कैप्टन जयसिंह मान ने सेना में रहकर देशसेवा की। उनके बाद उनके बेटे नायब सूबेदार अनिल कुमार ने भी सेना की वर्दी पहनकर राष्ट्रसेवा की। दादा की सैन्य सेवा और अनुशासन से प्रेरणा लेकर राकेश ने भी सेना को देशसेवा का माध्यम बनाया। परिवार के लिए सेना से जुड़ाव नौकरी से कहीं बढक़र सम्मान और जिम्मेदारी का विषय रहा है। इसी गांव के रिटायर्ड नायब सूबेदार बनवारी लाल का परिवार भी सैन्य परंपरा की मिसाल है। बनवारी लाल के बाद उनके बेटे हवलदार सुमेर सिंह ने सेना में सेवा दी और अब तीसरी पीढ़ी के रूप में उनके पोते हवलदार मुकेश कुमार भी सेना में देशसेवा कर चुके हैं। दादा, बेटे और पोते की तीन पीढिय़ों ने सेना की वर्दी पहनकर परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाया। भिर्र गांव में सेना के प्रति युवाओं का रुझान आज भी नजर आता है। गांव के पूर्व सैनिक युवाओं को सेना भर्ती की तैयारी के लिए प्रेरित करते हैं और सुबह मैदान में प्रशिक्षण भी देते हैं। यहां अफसर से लेकर जेसीओ और जवान तक विभिन्न रैंक पर युवाओं ने देश की सेवा की है।

चौथी पीढ़ी तक सेना की परंपरा, एक परिवार के 10 सदस्य फौज में
भिर्र गांव में सेना के प्रति समर्पण पीढिय़ों से चला आ रहा है। रिटायर्ड रामपत मान के परिवार की चौथी पीढ़ी देश सेवा की परंपरा निभा रही है। उनके पिता गोपाल, बेटा शीशराम व पौत्र राकेश व मुकेश सेना में हैं। सेना से रिटायर्ड जयवीर के परिवार की भी चौथी पीढ़ी भी देशसेवा की परंपरा को आगे बढ़ा रही है। उनके दादा पन्नाराम, पिता नत्थूराम सेना में थे और बेटा प्रतिम सेना में कार्यरत हैं। इसी गांव के हवलदार बख्तावर के परिवार की सैन्य परंपरा भी खास है। उनके परिवार के पांच बेटे और चार पौत्र सेना में सेवा देकर परिवार और गांव का गौरव बढ़ा रहे हैं। बख्तावर के बेटे अमरसिंह, किशनलाल, रघुवीर, रामनिवास और बलवान ने सेना में सेवा दी। इसके बाद अगली पीढ़ी में सुरेंद्र, मंजीत, संदीप और रविंद्र मान भी सेना में सेवा कर रहे हैं। इसी प्रकार चंदराम ने भी सेना में सेवा दी। उनके बाद उनके बेटे धर्मवीर, आजाद सिंह और कमल सिंह ने सेना की वर्दी पहनी। अब परिवार की अगली पीढ़ी में पोते भूपेंद्र, हरिश, संजीव और अमित देशसेवा की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
वर्दी उतर सकती है, जज्बा नहीं
भिर्र गांव के इन परिवारों की कहानी बताती है कि यहां सेना में जाना महज रोजगार नहीं, बल्कि परिवार की परंपरा और देशसेवा का संकल्प है। कई पीढिय़ों से चली आ रही यह परंपरा आज भी गांव के युवाओं को सेना में जाने के लिए प्रेरित कर रही है। भिर्र गांव के ये सैनिक परिवार बताते हैं कि सेना की वर्दी भले ही एक समय के बाद उतर जाती है, लेकिन देशसेवा का जज्बा परिवार में बना रहता है। दादा से बेटे और बेटे से पोते तक पहुंची यह परंपरा बताती है कि झुंझुनूं की धरती पर सेना के प्रति सम्मान और समर्पण कितना गहरा है। यही सैन्य संस्कार गांव के युवाओं को भी देश की सेवा के लिए प्रेरित कर रहे हैं।