माॅनिटरिग के अभाव में अभयारण्य परिसर में चर रहे हैं आवारा पशु

अमित प्रजापत
सुजानगढ़ (नवयत्न) । स्थानीय मरूदेश संस्थान के अध्यक्ष डॉ. घनश्याम नाथ कच्छावा ने राज्य के वन मंत्री, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, जिला कलक्टर और उप वन संरक्षक चूरू को अलग – अलग पत्र लिखकर ताल छापर अभयारण्य के कृष्ण मृगों को पालतू मवेशियों से होने वाले संक्रमित रोग मुंह खुरपका- मुंहपका (एफ एम डी ) होने की आशंका व्यक्त की हैं। पत्र में डाॅ. घनश्याम नाथ कच्छावा ने लिखा कि ताल छापर अभयारण्य में माॅनिटरिग के अभाव में सैंकड़ों मवेशी जिसमें गाय, भैंस, बकरी आदि अभयारण्य परिसर में दिन भर चरते हैं। यदि किसी भी मवेशी को यह रोग हुआ, तो यह बहुत शीघ्रता से कृष्ण मृगों में फैल सकता हैं।जिससे इन निरीह वन्य जीवों पर मौत का खतरा मंडरा रहा है। क्योंकि यह रोग पशुओं की लार से फैलता हैं। संक्रमित पशु की लार चरने वाली घास पर लगती है और वहां जब कृष्ण मृग यह घास चरेगा, तो निश्चित ही वो इस संक्रमण से बच नहीं सकता। पत्र में उल्लेख किया गया कि ताल छापर अभयारण्य के विकास हेतु सरकार करोड़ों रूपये खर्च कर रही है वहीं उसी परिसर में पशुओं की चराई होना विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की असंवेदनशीलता और निरीह वन्य जीवों के प्रति अनदेखी का द्योतक हैं। डॉ.घनश्याम नाथ कच्छावा ने मांग की हैं कि एक महामारी से कृष्ण मृगों की सुरक्षा के लिए आवारा पशुओं के चरने और विचरण पर प्रतिबंध लगाया जाये। साथ ही कृष्ण मृगों की सुरक्षा के लिए बेहतरीन माॅनिटरिग की जानी सुनिश्चित हो।

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