विनम्रता से होती है ज्ञान की प्राप्ति : आचार्य महाश्रमण
अबूबकर बल्खी
लाडनूं (नवयत्न) । तेरापंथ धर्मसंघ के अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण ने गुरुवार को सुधर्मा सभा में ‘शिक्षा के बाधक तत्त्व’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि श्रुत का भी अपना महत्त्व है। एक अल्प श्रुत होता है और एक बहु श्रुत होता है। अल्पश्रुत अर्थात् कम ज्ञान रखने वाला और बहुत ज्ञानी आदमी बहुश्रुत होता है। जो शास्त्रज्ञ हो, जो शास्त्रों की गहराई में पैठने वाला हो, ऐसा व्यक्ति बहु श्रुत बन सकता है। श्रुत की आराधना बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। श्रुत की आराधना करने वाले जिनेश्वर भगवान की आराधना करने वाले होते हैं। बारह प्रकार के बताए गए तपों में स्वाध्याय के समान कोई तप नहीं है। ज्ञान की आराधना को अविरल बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। शास्त्र में शिक्षा के पांच बाधक तत्त्व बताए गए हैं। इनमें पहला है-अहंकार। ज्ञान प्राप्ति में अहंकार बाधक होता है। शिक्षा प्रदान करने वाले शिक्षक के प्रति यदि कोई अविनय का भाव रखता तो उसे ज्ञान की प्राप्ति कैसे हो सकती है? अविनीत को कैसे ज्ञान प्राप्त हो सकता है। विनम्र होने से ज्ञान की प्राप्ति संभव हो सकती है। आचार्यश्री के प्रवचन से पूर्व साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। तदुपरान्त शासन गौरव साध्वी राजीमती ने अपने भावों की अभिव्यक्ति दी।
लाडनूं (नवयत्न) । तेरापंथ धर्मसंघ के अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण ने गुरुवार को सुधर्मा सभा में ‘शिक्षा के बाधक तत्त्व’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि श्रुत का भी अपना महत्त्व है। एक अल्प श्रुत होता है और एक बहु श्रुत होता है। अल्पश्रुत अर्थात् कम ज्ञान रखने वाला और बहुत ज्ञानी आदमी बहुश्रुत होता है। जो शास्त्रज्ञ हो, जो शास्त्रों की गहराई में पैठने वाला हो, ऐसा व्यक्ति बहु श्रुत बन सकता है। श्रुत की आराधना बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। श्रुत की आराधना करने वाले जिनेश्वर भगवान की आराधना करने वाले होते हैं। बारह प्रकार के बताए गए तपों में स्वाध्याय के समान कोई तप नहीं है। ज्ञान की आराधना को अविरल बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। शास्त्र में शिक्षा के पांच बाधक तत्त्व बताए गए हैं। इनमें पहला है-अहंकार। ज्ञान प्राप्ति में अहंकार बाधक होता है। शिक्षा प्रदान करने वाले शिक्षक के प्रति यदि कोई अविनय का भाव रखता तो उसे ज्ञान की प्राप्ति कैसे हो सकती है? अविनीत को कैसे ज्ञान प्राप्त हो सकता है। विनम्र होने से ज्ञान की प्राप्ति संभव हो सकती है। आचार्यश्री के प्रवचन से पूर्व साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। तदुपरान्त शासन गौरव साध्वी राजीमती ने अपने भावों की अभिव्यक्ति दी।