‘तत्काल’ आदेश एक माह तक लटका, अब जांच की मांग
सुरेंद्र शर्मा
झुंझुनूं (नवयत्न)। पंजीयन एवं मुद्रांक विभाग के महानिरीक्षक, अजमेर द्वारा 10 जुलाई 2026 को जारी ‘तत्काल प्रभाव से’ स्थानांतरण आदेश की करीब एक माह तक पालना नहीं होने का मामला अब उच्च स्तर तक पहुंच गया है। इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, आईजी एवं डीआईजी, पंजीयन एवं मुद्रांक तथा जिला कलेक्टर झुंझुनू को ई-मेल के माध्यम से शिकायत भेजकर पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांग की गई है। शिकायत में 12 अगस्त को प्रकाशित समाचार टेक्निकल इश्यू खत्म, तत्काल आदेश को लटकाने की जांच कब? का हवाला देते हुए कहा गया है कि महानिरीक्षक के आदेश में 95 कार्मिकों के स्थानांतरण किए गए थे। इनमें क्रमांक 38 पर त्रिलोक सिंह का झुंझुनंू से कोटपूतली स्थानांतरण किया गया था। आदेश तत्काल प्रभाव से होने के बावजूद संबंधित कार्मिक को करीब एक माह तक कार्यमुक्त नहीं किए जाने और कोटपूतली में समय पर कार्यभार ग्रहण नहीं करने को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
पहले डीएलसी, फिर ‘टेक्निकल इश्यू’ पर सवाल
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि शुरुआत में संबंधित कार्मिक को कार्यमुक्त नहीं किए जाने के पीछे डीएलसी कार्य का हवाला दिया गया। बाद में डीएलसी संबंधी कार्य पूर्ण होने और उसका प्रकाशन होने की बात सामने आने के बावजूद आदेश की पालना नहीं हुई। इसके बाद ‘टेक्निकल इश्यू’ को देरी का कारण बताए जाने का उल्लेख शिकायत में किया गया है। शिकायतकर्ता ने सवाल उठाया है कि यदि वास्तव में कोई तकनीकी अथवा प्रशासनिक बाधा थी तो क्या उसके संबंध में सक्षम स्तर से लिखित अनुमति ली गई थी? यदि नहीं, तो महानिरीक्षक के तत्काल प्रभाव वाले आदेश को रोकने अथवा उसकी पालना में देरी करने का अधिकार आखिर किसके पास था?
रिकॉर्ड खंगालने की मांग
शिकायत में संबंधित अवधि की उपस्थिति पंजिका, मूवमेंट रजिस्टर, कार्यमुक्ति आदेश, कार्यभार ग्रहण रिपोर्ट, डाक रजिस्टर, ई-फाइल, फाइल नोटिंग और विभागीय पत्राचार की जांच कराने की मांग की गई है। साथ ही यह पता लगाने को कहा गया है कि देरी की अवधि में संबंधित कार्मिक ने किस कार्यालय में उपस्थिति दी, किस पद पर कार्य किया तथा उसका वेतन और उपस्थिति किस कार्यालय से संचालित हुई।
‘तत्काल प्रभाव’ की पालना रोकने का अधिकार किसे?
शिकायत में यह भी जांच का विषय बनाया गया है कि महानिरीक्षक द्वारा तत्काल प्रभाव से जारी आदेश की पालना रोकने या उसमें विलंब करने का अधिकार संबंधित अधीनस्थ अधिकारी को था या नहीं। यदि किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी द्वारा जानबूझकर आदेश की पालना में देरी की गई है तो उसकी जिम्मेदारी निर्धारित कर नियमानुसार विभागीय कार्रवाई की मांग की गई है।
सिर्फ चार्ज दिलाना पर्याप्त नहीं
शिकायतकर्ता का कहना है कि बाद में नवागत कार्मिक को चार्ज दिला देना ही पूरे मामले का समाधान नहीं है। करीब एक माह तक आदेश की पालना क्यों नहीं हुई, किसके निर्देश पर नहीं हुई और इस दौरान विभागीय प्रक्रिया किस स्तर पर रुकी रही—इन सवालों का जवाब जांच से सामने आना चाहिए। शिकायत में यह भी मांग की गई है कि जांच पूरी होने तक संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों/कर्मचारियों को निलंबित अथवा पद से हटाकर जांच को प्रभावित होने से रोकने पर विचार किया जाए तथा दोषी पाए जाने पर कठोर विभागीय कार्रवाई की जाए।
अन्य स्थानांतरणों की भी जांच हो
शिकायत में यह महत्वपूर्ण मांग भी रखी गई है कि जांच केवल त्रिलोक सिंह के प्रकरण तक सीमित नहीं रहे, बल्कि यह भी पता लगाया जाए कि 10 जुलाई को जारी 95 स्थानांतरण आदेशों में अन्य कार्मिकों के मामलों में भी तत्काल प्रभाव वाले आदेशों की पालना में देरी हुई थी या नहीं। यदि ऐसे अन्य मामले सामने आते हैं तो उनकी भी जांच कर जिम्मेदारी तय करने की मांग की गई है।
रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग
मामले से जुड़े विभागीय रिकॉर्ड में बाद में किसी प्रकार का परिवर्तन अथवा हेरफेर न हो, इसके लिए संबंधित दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के निर्देश जारी करने की भी मांग की गई है। शिकायतकर्ता ने समाचार पत्र में प्रकाशित तथ्यों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि कराने और यदि किसी तथ्य को गलत पाया जाता है तो विभागीय रिकॉर्ड के आधार पर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करने की मांग की है।
अब सवाल यह है कि महानिरीक्षक के आदेश के बावजूद करीब एक माह तक उसकी पालना क्यों रुकी रही और इस देरी की जवाबदेही किसकी है? शिकायत उच्च अधिकारियों तक पहुंचने के बाद अब निगाहें विभागीय जांच और कार्रवाई पर टिकी हैं।