4 बार महाजन, 4 मर्तबा मुस्लिम, 1 बार जाट- अब 10वीं बार किसके सिर सजेगा ताज
सुरेन्द्र शर्मा
झुंझुनू (नवयत्न)। नगर निकाय चुनाव से पहले अध्यक्ष पद की लॉटरी में झुंझुनू नगर परिषद का पद सामान्य होने के साथ ही शहर की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। झुंझुनू नगर परिषद में अब तक चार बार महाजन समाज, चार बार मुस्लिम समाज और एक बार जाट समाज से निकाय प्रमुख बन चुके हैं। ऐसे में अब 10वीं बार सभापति का ताज किसके सिर सजेगा, यह सवाल राजनीतिक गलियारों से लेकर शहर की चौपाल तक चर्चा का विषय बना हुआ है। इस बार तस्वीर इसलिए भी दिलचस्प है कि सभापति का चुनाव सीधे जनता नहीं करेगी। जनता पार्षद चुनेगी और वही पार्षद आपस में बहुमत के आधार पर शहरी सरकार का मुखिया तय करेंगे। ऐसे में इस चुनाव में केवल पार्षद बनना ही महत्वपूर्ण नहीं होगा, बल्कि चुनाव परिणाम के बाद किस खेमे के पास कितने पार्षद हैं, यही सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल होगा।

जातीय समीकरण से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा पार्षदों का गणित
झुंझुनू की राजनीति में महाजन, मुस्लिम और जाट समाज का प्रभाव अलग-अलग दौर में दिखाई देता रहा है। चार बार महाजन और चार बार मुस्लिम समाज को निकाय प्रमुख का अवसर मिलना शहर की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों का संकेत माना जा सकता है। वहीं जाट समाज को अब तक एक बार यह अवसर मिला है। सामान्य सीट होने के बाद इस बार मुकाबला किसी एक समाज तक सीमित रहने की संभावना कम है। व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव, वार्ड स्तर की पकड़, प्रत्याशियों के आपसी संबंध और चुनाव के बाद बनने वाले गठजोड़ सभापति के चुनाव में निर्णायक साबित हो सकते हैं।

विधायक का ग्राफ चढ़ा नहीं, सांसद से भी नाराजगी की चर्चा
झुंझुनू की शहरी राजनीति में मौजूदा विधायक और सांसद की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। विधानसभा चुनाव के बाद विधायक का राजनीतिक ग्राफ अपेक्षित गति से ऊपर नहीं उठ पाने की चर्चा राजनीतिक हलकों में होती रही है। दूसरी ओर सांसद को लेकर भी शहर के एक वर्ग में नाराजगी की बातें सामने आती रही हैं। हालांकि इन चर्चाओं की वास्तविक राजनीतिक ताकत का पता निकाय चुनाव के परिणामों से ही चलेगा। यदि किसी दल को अपेक्षा से कम पार्षद मिलते हैं तो इसे स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता और संगठन की स्थिति से जोड़कर देखा जा सकता है।

कांग्रेस को मुस्लिम तो भाजपा को हिन्दू मतदाताओं से उम्मीद
झुंझुनू की चुनावी राजनीति में मुस्लिम और हिन्दू मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। कांग्रेस को मुस्लिम मतदाताओं के परंपरागत समर्थन की उम्मीद रहती है, जबकि भाजपा को हिन्दू मतदाताओं के व्यापक समर्थन पर भरोसा रहता है। लेकिन निकाय चुनाव में केवल वोट बैंक की राजनीति पर्याप्त नहीं होगी। वार्ड स्तर पर प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय मुद्दे, संगठन की सक्रियता और चुनाव के बाद पार्षदों के बीच बनने वाले समीकरण ही सभापति की कुर्सी का रास्ता तय करेंगे।
जाट राजनीति की भी परीक्षा-प्रभाव बड़ा, लेकिन निकाय प्रमुख सिर्फ एक बार
जाट समाज झुंझुनू की राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली भूमिका निभाता रहा है। इसके बावजूद नगर परिषद के शीर्ष पद पर अब तक एक ही बार जाट समाज की ताजपोशी हुई है। सामान्य सीट के बाद इस बार जाट समाज से भी कई दावेदार सामने आ सकते हैं। सवाल यह है कि क्या समाज अपने किसी एक चेहरे के पीछे राजनीतिक रूप से एकजुट हो पाएगा या वार्ड स्तर के अलग-अलग समीकरण दावे को कमजोर कर देंगे ?
सुदेश अहलावत-काम की चर्चा या आरोपों की छाया ?
झुंझुनू की मौजूदा राजनीतिक चर्चाओं में पूर्व सभापति सुदेश अहलावत का नाम भी सामने आता है। उनके समर्थक उनके कार्यकाल में हुए विकास कार्यों को गिनाते हैं, जबकि राजनीतिक विरोधी उनके कार्यकाल को लेकर भ्रष्टाचार सहित विभिन्न आरोपों की चर्चा करते रहे हैं। राजनीति में धारणा कई बार काम से ज्यादा प्रभावशाली होती है। समर्थक उपलब्धियां गिनाते हैं तो विरोधी उसी कार्यकाल को अलग नजरिए से देखते हैं। ऐसे में निकाय चुनाव में जनता और पार्षद किस राजनीतिक धारणा को स्वीकार करते हैंए यह महत्वपूर्ण होगा।
अहलावत का सक्रिय राजनीति से दूर होना भाजपा के लिए नुकसान ?
सुदेश अहलावत के सभापति रहने के बाद अगले चुनाव में मैदान में नहीं उतरने और झुंझुनू की सक्रिय राजनीति से दूरी बनने को लेकर भी भाजपा के भीतर चर्चाएं रही हैं। राजनीतिक हलकों का एक वर्ग मानता है कि पांच वर्ष तक नगर परिषद की कमान संभालने वाले स्थानीय चेहरे का सक्रिय राजनीति से दूर होना संगठन के लिए नुकसानदायक रहा। हालांकि इसका वास्तविक असर कितना रहा, यह चुनाव परिणाम ही बताएंगे। खास तौर पर उन लोगों की राजनीतिक स्थिति भी इस चुनाव में देखी जाएगी, जिन्होंने अहलावत के कार्यकाल में उनके साथ राजनीतिक रूप से कदम बढ़ाए थे।
गुढ़ा : किंग नहीं तो किंगमेकर!
उप चुनाव में 38,751 वोट लेकर भाजपा की जीत का रास्ता किया आसान, अब निकाय चुनाव में प्रभाव की परीक्षा
झुंझुनू की राजनीति में पूर्व मंत्री राजेन्द्र सिंह गुढ़ा की भूमिका को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। विधानसभा उप चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में गुढ़ा ने 38,751 वोट हासिल किए। भाजपा प्रत्याशी राजेन्द्र भाम्बू विजयी रहे, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी एवं सांसद पुत्र अमित ओला को 47,577 वोट मिले। दोनों के बीच 8,826 मतों का अंतर रहा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि गुढ़ा को मिले वोटों ने कांग्रेस के परंपरागत समीकरण को प्रभावित किया और भाजपा प्रत्याशी की जीत का रास्ता आसान किया। इसी वजह से उप चुनाव के बाद झुंझुनू की राजनीति में गुढ़ा को लेकर यह चर्चा तेज हुई कि वे खुद सत्ता हासिल करें या किसी दूसरे राजनीतिक खेमे को सत्ता तक पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाएं।
उप चुनाव के बाद भी सक्रिय रहे गुढ़ा
उप चुनाव परिणाम के बाद भी गुढ़ा लगातार सक्रिय नजर आए। स्थानीय मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाना और प्रशासनिक स्तर पर बेबाक तरीके से सवाल उठाना उनकी राजनीतिक शैली का हिस्सा रहा। प्रशासन से जुड़े कई मामलों में उनकी मुखरता चर्चा में रही। सरकार की ओर से उनके खिलाफ किसी बड़े कदम के अभाव को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में अलग-अलग चर्चाएं होती रही हैं।
गधे के 70 हजार रुपये से लेकर पुलिस से बहसबाजी तक-सुर्खियों में रहे गुढ़ा
गुढ़ा से जुड़े कई मामले उन्हें लगातार सुर्खियों में बनाए रखते रहे हैं। मृत गधे के 70 हजार रुपये दिलाने का मामला भी राजनीतिक चर्चा का विषय बना और इसके बाद गुढ़ा का नाम शहर की चौपाल से लेकर सोशल मीडिया तक पहुंचा। वहीं शहर में एक अवैध निर्माण पर नगर परिषद आयुक्त की कार्रवाई के दौरान पुलिस के साथ हुई बहसबाजी ने भी उन्हें झुंझुनू शहर की राजनीति में चर्चा के केंद्र में ला दिया। समर्थक इसे उनकी बेबाकी और जनता के मुद्दों पर सक्रियता बताते हैं, जबकि विरोधी इसे राजनीतिक स्टंट करार देते हैं। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से एक बात साफ है-इन घटनाओं ने गुढ़ा को लगातार राजनीतिक चर्चा में बनाए रखा।
शहरी मतदाता गुढ़ा के साथ ? अब होगी असली परीक्षा
गुढ़ा समर्थकों का दावा है कि झुंझुनू शहर में उनका व्यक्तिगत प्रभाव और संपर्क मजबूत है। विरोधी इस दावे को राजनीतिक प्रचार से ज्यादा नहीं मानते। निकाय चुनाव इस दावे की वास्तविक परीक्षा साबित हो सकती है। यदि गुढ़ा के प्रभाव वाले प्रत्याशी बड़ी संख्या में पार्षद बनकर आते हैं तो उनकी राजनीतिक पकड़ का संदेश मजबूत होगा। इसके बाद सभापति के चुनाव में उनके पास अपने समर्थकों का पर्याप्त संख्या बल रहा तो उनकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
सरकार ने बढ़ाई गुढ़ा की लोकप्रियता ?
राजनीतिक रूप से गुढ़ा की लोकप्रियता को लेकर एक दिलचस्प धारणा यह भी है कि जिन विवादों और घटनाओं को उनके विरोधी उनकी कमजोरी मानते हैं, उन्हीं घटनाओं ने उन्हें लगातार जनता के बीच चर्चा में बनाए रखा। मृत गधे के मुआवजे से लेकर प्रशासनिक कार्रवाई के मामलों तक गुढ़ा का नाम लगातार खबरों में रहा। समर्थक इसे उनकी सक्रियता का परिणाम बताते हैं, जबकि विरोधी इसे सुर्खियां बटोरने की राजनीति कहते हैं। सच चाहे जो होए इन घटनाओं ने गुढ़ा की राजनीतिक दृश्यता जरूर बढ़ाई है।
अब असली परीक्षा पार्षदों की
नगर परिषद अध्यक्ष पद सामान्य होने के बाद सभापति पद के दावेदारों की संख्या बढ़ना तय माना जा रहा है। लेकिन किसी भी चेहरे के लिए केवल चुनाव जीतना पर्याप्त नहीं होगा। असली चुनौती निर्वाचित पार्षदों के बीच बहुमत जुटाने की होगी।
यही वजह है कि आने वाले दिनों में झुंझुनू की राजनीति में सवाल यह नहीं रहेगा कि कौन चुनाव जीत रहा है, बल्कि यह होगा कि किसके साथ कितने पार्षद हैं ?
चार बार महाजन, चार मर्तबा मुस्लिम और एक बार जाट समाज को मिल चुके झुंझुनू नगर परिषद के शीर्ष पद पर अब 10वीं बार किस समाज, किस राजनीतिक खेमे और किस चेहरे का कब्जा होगा-यह केवल चुनाव परिणाम से तय नहीं होगा। असली खेल चुनाव के बाद शुरू होगा। और इसी खेल में राजेन्द्र सिंह गुढ़ा की भूमिका सबसे दिलचस्प हो सकती है। किंग बनें या किंगमेकर-निकाय चुनाव में गुढ़ा की राजनीतिक ताकत की असली परीक्षा अब झुंझुनू शहर में होगी।