सावन में बिसाऊ की शिवभक्ति… बुढिय़ा महादेव के दर्शन के बाद शुरू होती है लोगों की दिनचर्या
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बिसाऊ (नवयत्न)। सावन मास में भगवान शिव की भक्ति का रंग पूरे बिसाऊ में दिखाई देता है। कस्बे के बीच स्थित प्राचीन सेठ बुढिय़ा महादेव मंदिर आज भी लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां बड़ी संख्या में लोग सुबह सबसे पहले भगवान शिव के दर्शन करते हैं और इसके बाद अपनी दिनचर्या शुरू करते हैं। कई दुकानदार भी दुकान खोलने से पहले बुढिय़ा महादेव के दरबार में शीश नवाते हैं। साहित्यकार डॉ. उदयवीर शर्मा और शिक्षाविद अमोलक चंद जागीड़ की पुस्तक बिसाऊ दिग्दर्शन के अनुसार बुढिय़ा महादेव मंदिर बिसाऊ नगर की स्थापना से भी पहले का बताया जाता है। मंदिर के निर्माण काल का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। करीब 300 वर्ष पहले बिसाऊ को विशाले की ढाणी के नाम से जाना जाता था। उस समय वर्तमान मंदिर स्थल पर बड़ा जोहड़ हुआ करता था और उसी जोहड़ के मध्य भाग में शिवालय बना हुआ था।
जोहड़ के बीच था शिवालय, अब जमीन के नीचे हैं शिवलिंग
बताया जाता है कि उस समय बिसाऊ चारों ओर मिट्टी के टीलों से घिरा हुआ था। यही वजह रही कि कस्बे की बसावट अपेक्षाकृत नीची भूमि पर हुई और मुख्य बाजार भी नीचे स्थित है। वर्तमान मंदिर में प्रवेश के लिए मुख्य द्वार से पांच सीढिय़ां चढऩी पड़ती हैं। इसके बाद गर्भगृह में स्थित शिवलिंग के दर्शन के लिए करीब 10 सीढिय़ां नीचे उतरना पड़ता है। मंदिर की बनावट आज भी इसके प्राचीन इतिहास की याद दिलाती है। मान्यता के अनुसार पहले जोहड़ की चौबी पर एक छोटा शिवालय था। इसी में शिवलिंग स्थापित था और उसका मुख्य दरवाजा दक्षिण दिशा में खेजड़ी के पेड़ के पास खुलता था। बाद में राजठिकाने के कामदार या ठाकुर ने यहां पूजा-अर्चना की। मनोकामना पूरी होने के बाद राजठिकाने की ओर से भव्य मंदिर का निर्माण करवाया गया। वर्तमान में मंदिर का मुख्य द्वार उत्तर दिशा में है।
सावन में हर रात शिव महिम्न पाठ, सोमवार को भजन संध्या
मंदिर के पंडित सुनील शास्त्री के अनुसार सावन मास में हर रात मंदिर परिसर में करीब 45 मिनट तक शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ किया जाता है। पूरे साल प्रत्येक सोमवार रात को भजन संध्या होती है। शिवभक्त कांवड़ लेकर पहुंचते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। महाशिवरात्रि पर मंदिर में फूलों से विशेष श्रृंगार, चार पहर की पूजा, रुद्राभिषेक और पंचमेवे की प्रसादी का आयोजन होता है। 31 दिसंबर को नववर्ष के स्वागत और मंदिर के वार्षिकोत्सव पर रात्रि जागरण, रुद्राभिषेक और प्रसादी भंडारा भी आयोजित किया जाता है।
गंगोत्री से गलता-लोहार्गल तक से कांवड़ लाकर अभिषेक
शिवभक्त बुढिय़ा महादेव के लिए दूर-दूर से कांवड़ लेकर आते हैं। भक्त गंगोत्री, हरिद्वार, गलता और लोहार्गल से कांवड़ लाकर शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। शिवभक्त बसोतिया ने बताया कि वे गंगोत्री धाम कांवडिय़ा संघ के तत्वावधान में चार बार गोमुख से, 11 बार हरिद्वार से तथा दो-दो बार गलता और लोहार्गल से कांवड़ ला चुके हैं। ओमप्रकाश जलधारी भी गोमुख और हरिद्वार से कई बार कांवड़ लाकर भगवान शिव का अभिषेक कर चुके हैं।
2019 में हुआ मंदिर का जीर्णोद्धार
मंदिर का जीर्णोद्धार 4 मार्च 2019 को स्वर्गीय सीताराम मिश्र की स्मृति में उनकी पत्नी गिन्नी देवी मिश्र ने करवाया। मंदिर के आगे चौक का निर्माण 2 अगस्त 1982 को स्वर्गीय पंडित नेतराम मिश्र की स्मृति में उनके पुत्र स्वर्गीय मोतीलाल मिश्र ने करवाया था।
132 फीट ऊंचे नीलकंठ महादेव के भी दर्शन
बिसाऊ में शिवभक्ति का एक और प्रमुख केंद्र 132 फीट ऊंची नीलकंठ महादेव की प्रतिमा है। जटिया परिवार की ओर से निर्मित इस प्रतिमा के स्थापना के बाद से अब तक करीब सवा पांच करोड़ श्रद्धालुओं के दर्शन करने का दावा किया जाता है। केयरटेकर नंदलाल सैनी के अनुसार नीलकंठ महादेव प्रतिमा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि करीब 10 किलोमीटर के क्षेत्र में आने वाले गांव-ढाणियों के लोगों को घर बैठे भी भगवान नीलकंठ के दर्शन हो जाते हैं। सावन और महाशिवरात्रि के दौरान यहां विशेष रूप से शिवभक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
पत्नी की स्मृति में सेठ महाबीर प्रसाद जटिया ने बनवाई प्रतिमा
नीलकंठ महादेव की प्रतिमा बिसाऊ निवासी स्वर्गीय सेठ महाबीर प्रसाद जटिया ने अपनी पत्नी स्वर्गीय समित्रा देवी जटिया की स्मृति में बनवाई थी। इसका लोकार्पण 26 फरवरी 2011 को तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने किया था। प्रतिमा के निर्माण में करीब 100 टन स्टील के सरिए और 2500 सीमेंट के कट्टे लगाए गए। विशेष तकनीक से धातु पर कोटिंग की गई है। प्रतिमा स्थल पर नवग्रह, 11 ज्योतिर्लिंग और अष्टविनायक के मंदिर भी बनाए गए हैं।