कल का इंतजार… अब्दुल्ला की ताजपोशी या फिर पितृपक्ष तक विराम?

संजय सोनी 

झुंझुनूं (नवयत्न)। नगर परिषद के नए सभापति चुने गए अब्दुल्ला गुलाम नबी की ताजपोशी को लेकर अब शहर में दिलचस्प चर्चा शुरू हो गई है। सभापति का चुनाव हो चुका है, बहुमत भी उनके पक्ष में रहा, लेकिन अब सवाल यह है कि वे नगर परिषद की कुर्सी पर औपचारिक रूप से कब बैठेंगे?
इसके लिए 25 सितंबर का दिन खास माना जा रहा है। इसके बाद 26 सितंबर से पितृपक्ष शुरू हो जाएगा, जो 10 अक्टूबर तक चलेगा। परंपरागत रूप से हिंदू समाज में पितृपक्ष के दौरान शुभ कार्य और नई शुरुआत से परहेज किया जाता है। हालांकि हिंदू और मुस्लिम रीति-रिवाज अलग-अलग हैं, लेकिन नगर परिषद का नेतृत्व पूरे शहर का है और शहर की आबादी में सभी समुदायों की बराबर भागीदारी है। यही वजह है कि रीति-रिवाजों को लेकर भी शहर में तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं।
कुर्सी किसी की हो, सवाल शहर के हैं
सभापति की कुर्सी पर बैठने वाला व्यक्ति किसी भी धर्म या समुदाय से हो, नगर परिषद की समस्याएं उसके सामने एक जैसी रहती हैं। सफाई, सड़क, रोशनी, अतिक्रमण, नालियां और विकास कार्यों को लेकर शहर की जनता को जवाब चाहिए। ऐसे में अब नजर इस बात पर है कि नवनिर्वाचित सभापति कब औपचारिक रूप से कार्यभार संभालते हैं।

कल का दिन इसलिए अहम

शहर की राजनीतिक चर्चाओं में 25 सितंबर को लेकर खासा कौतूहल है। यदि शुक्रवार को अब्दुल्ला गुलाम नबी पदभार ग्रहण कर लेते हैं तो तस्वीर साफ हो जाएगी। लेकिन यदि ऐसा नहीं होता और ताजपोशी पितृपक्ष के बाद तक टलती है, तो राजनीतिक गलियारों में इसे अलग-अलग नजरिए से देखा जाएगा। शहर में चर्चा है कि क्या इसके पीछे केवल परंपराओं का सवाल है या फिर राजनीतिक स्तर पर भी अभी अंतिम हरी झंडी का इंतजार है।

अब गांव की ओर भी नजरें

इसी बीच राजनीतिक चर्चाओं का दायरा नगर परिषद से निकलकर गांवों तक पहुंच गया है। आम चर्चा है “असली भारत गांवों में बसता है और चुनाव सिर पर हैं।” ऐसे में आने वाले दिनों में राजनीतिक आकाओं की ग्रामीण क्षेत्रों में आवाजाही बढ़ना तय माना जा रहा है।

पहले गांवों की जनता से मुलाकात होगी

उसके बाद शहर की जनता भी अपने सवाल लेकर सामने आएगी। नगर परिषद की नई सत्ता के सामने अब असली परीक्षा ताजपोशी से ज्यादा शहर की समस्याओं और जनता की अपेक्षाओं को लेकर होगी।

 

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