धन-संपत्ति यहीं रह जाएगी, आत्मधन ही साथ जाएगा : बाबा उमाकान्त

निसं
जयपुर (नवयत्न)। परम् पूज्य संत बाबा उमाकान्त महाराज ने सत्संग में कहा कि संसार में मनुष्य के काम आने वाली स्थायी वस्तु कोई नहीं है। व्यक्ति को अपने कर्मों के अनुसार जीवन में सुख-दुख और आवश्यक साधन मिलते हैं। उन्होंने कहा कि परमात्मा ने जीव के लिए जन्म से पहले ही भोजन की व्यवस्था कर रखी है, इसलिए मनुष्य को अपने घरए शरीर और धन-संपत्ति को स्थायी मानकर अहंकार नहीं करना चाहिए। अंतत: सभी भौतिक वस्तुएं यहीं छोड़कर जाना पड़ता है। उन्होंने कंजूस सेठ और महात्मा का दृष्टांत सुनाते हुए समझाया कि मृत्यु के बाद मनुष्य अपने साथ क्या लेकर जा सकता है। उन्होंने बताया कि एक कंजूस सेठ हमेशा घर के बाहर बैठकर लोगों को देखता रहता था और साधु-महात्माओं से बचता था कि कहीं वे कुछ मांग न लें। एक दिन एक महात्मा उसके पास पहुंचे। सेठ ने उनका सम्मान किया तो महात्मा ने कहा कि वे कुछ मांगने नहीं, बल्कि उसे कुछ देने आए हैं। महात्मा ने सेठ को एक सुई देते हुए कहा कि इसे अपने साथ रख लेना और जब वे बाद में मिलें तो सुई वापस कर देना। सेठ ने कहा कि जब उसके पूर्वज भी अपने साथ कुछ नहीं ले जा सके तो वह सुई कैसे ले जा सकता है। इस पर महात्मा ने उसे जीवन की वास्तविकता का बोध कराते हुए कहा कि मनुष्य संसार में कुछ लेकर नहीं आता और मृत्यु के समय भी धन-दौलत साथ नहीं ले जा सकता। बाबा उमाकान्त महाराज ने कहा कि इसी बात को समझने की जरूरत है। कि जब इस संसार से जाना ही है तो जहां जाना है, उसके लिए भी कुछ काम करना चाहिए। उन्होंने समर्थ गुरु से मार्गदर्शन लेकर आत्मधन अर्जित करने की बात कही और बताया कि यह आत्मधन संसार में भी उपयोगी है। तथा मृत्यु के बाद भी साथ रहता है। उन्होंने सत्संग के माध्यम से लोगों को अपने कर्मों और आध्यात्मिक जीवन पर विचार करने का संदेश दिया।

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