राष्ट्रीय प्राकृत विद्वत् कार्यशाला का हुआ शुभारम्भ
अबुबकर बल्खी
लाडनूं (नवयत्न)। जैन विश्व भारती संस्थान में प्राकृत एवं संस्कृत विभाग के तत्वावधान में ‘प्राकृत रचना-धर्मिता के मानक मापदण्ड तथा शोध की भावी योजनाएं’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय प्राकृत विद्वत् कार्यशाला का शुभारंभ गुरुवार को अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण के सान्निध्य में हुआ। आचार्य श्री महाश्रमण ने अपने सम्बोधन में कहा कि प्राकृत भाषा के साथ संस्कृत व हिन्दी एक परिवार के रूप में है। भारत सरकार ने प्राकृत भाषा को शास्त्रीय भाषा के रूप में मान्यता प्रदान की है। इस भाषा के उत्थान व विकास के लिए प्रयास करना चाहिए। आगे कहा कि जैन विश्वभारती संस्थान प्राकृत भाषा के विकास को समर्पित केन्द्र बन सकता है। कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने कहा कि यह संस्थान प्राकृत भाषा का प्रमुख केन्द्र बने। जरूरत है कि देश भर के प्राकृत संस्थान व विद्वज्जन समन्वित होकर कार्य करें तो हम और अधिक सक्षमता से कार्य कर सकेगें। मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित विद्वान् प्रो. प्रेम सुमन जैन ने कहा कि प्राकृत भाषा के उत्थान एवं विकास की दृष्टि से कुछ संस्थाएं विद्वान तैयार कर रही है। उन्होंने कहा कि प्राकृत भाषा के क्षेत्र में कार्य कर रही संस्था ‘भारतीय प्राकृत स्काॅलर सोसायटी’ का केन्द्र भी यहां होना चाहिए। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. धर्मचन्द्र जैन ने प्राकृत भाषा की प्रासंगिकता, उसकी सांस्कृतिक धरोहर और शोध की संभावनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। विशिष्ट अतिथि एल.डी. इंस्टिट्यूट ऑफ इंडोलॉजी अहमदाबाद के पूर्व निदेशक प्रो. जितेन्द्र बी. शाह ने भी अपने विचार रखे।